सनातनी हमेशा विश्व कल्याण की बात करते हैं, किसी धर्म विशेष की नहीं: स्वामी प्रज्ञानानंद जी महाराज
Seoni 17 March 2025
सिवनी यशो:- भगवान विजेन्द्र नंदन की परम कृपा से भगवान श्रीकृष्ण की भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। जिन परमात्मा की कृपा से सृष्टि बनती है, उन्हीं परमात्मा की कृपा के अवलंबन से भगवान कृष्ण के नाम स्वरूप युगल किशोर जी के मन में भी एक संकल्प के सृजन का भागवत कथा के आरंभ का, भागवत कथा के स्वरूप का शुभारंभ करा जाये, आज उसी संकल्प का स्वरूप है।
आज हम उसी भगवती गंगा में शामिल होने के बडभागी बन रहे हैं। ये संकल्प जब हमारे पास आया माँ भगवती के चरणों में बैठकर नंदीकेश्वर धाम में होनी है। लेकिन इतना विराट स्वरूप हो जायेगा, 108 यजमानों की जगह 125 यजमानों का होना भी महत्वपूर्ण नहीं बल्कि सवा सौ करोड़ देशवासियों की भावनाएं इसमें शामिल हो गई। सत्कर्म हो रहा है, यह सत्कर्म सनातनियों के द्वारा सनातनियों के लिये किया जा रहा है और जो सनातनियों के लिये किया जाता है वह व्यक्ति विशेष के लिये नहीं होता है। सनातनियों द्वारा कहा जाता है- विश्व का कल्याण हो। उक्त उद्गार ब्रम्हलीन शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती महाराज के परम तपस्वी शिष्य स्वामी प्रज्ञानानंद जी महाराज ने नंदीकेश्वर धाम में आयोजित अष्टोत्तरशत श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस धर्मप्रेमी बंधुओं को संबोधित करते हुये व्यक्त किये।
महाराज श्री ने आगे कहा कि,सनातनी हमेशा विश्व के कल्याण की बात करते हैं, सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित दु:खभाग भवेत।। की उदात्य भावना है, चेतना है। यह सब सनातनियों में है, हम किसी एक संप्रदाय की जय नहीं बोलते, क्योंकि,जो लोग धर्म पर निष्ठा रखते हैं, संकल्प में रहते हैं, उन सबका जय हो, पराजय किसी की न हो। ऐसे अनुष्ठान के लिये तीन सूत्र की आवश्यकता होती है। पहला सूत्र है इच्छा यत्न की आवश्यकता होती है, लौकिक इच्छा के लिये हमारे मन में बहुत इच्छा होती है, लेकिन ऐसे आलौकिक कार्य के लिये मानव मन में इच्छा हो रही है। भागवत कथा का प्रसाद है लौकिक इच्छा के लिये इच्छा हो समान्य बात है, लेकिन ऐसा भाव मन में प्रकट होता है भगवान ही कारण होते हैं। परमात्मा की इच्छा यत्न से परमात्मा की इच्छा से ही संभव हुआ है।
आपने आगे कहा कि,हमारे यहाँ पर दो गंगायें हैं एक भागरथी गंगा और दूसरी भागवती गंगा भागीरथी गंगा के पास जाना पडता है और भागवती गंगा स्वयं पास चल कर आती है। उस गंगा में स्नान करना है तो तुम्हें प्रयाग जाना पडेगा लेकिन इस गंगा की विलक्ष्ण कृपा है। दोनों ही गंगा के लिये कारण भगवान हीं हैं। भागवती गंगा भगवान के मुखरविंद से प्रकट हुई है और भागरथी गंगा भगवान के चरणों से प्रकट हुई है भागीरथी गंगा चरणों से निकली और शंकर जी की जटाओं में आकर समा गई और भागवती गंगा मुखारबिंद से निकली और हृदय से होकर जिव्हा से निकली दोनों ही का कारण भगवान हैं। एक सप्ताह तक होने वाली इस भागवत में हम सभी श्रवण करेंगे।
प्रथम दिवस की कथा सुनाते हुये महाराज श्री ने कहा कि हम जब यहां आ रहे थे तो हमारे मन में यह विचार था कि भागवत कथा का क्या विषय चुना जाये तो मन में विचार आया कि क्यों न माँ भगवती के चरणों में बैठकर भागवत कथा कही जा रही है तो भगवती का ही स्वरूप गोपियों को कथा का विषय चुना जाये। कहना तो भागवत ही है तो क्यों न इस बार भागवत कथा का विषय गोपी गीत चुना जाये। सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि, गोपियाँ कौन है? गोपियों को स्त्री समझना यह हमारे भूल होगी गोपी स्त्री है न पुरूष गोपी भाव है। देह भाव से मुक्त करके आत्म निष्ठ कर दे वही गोपी भाव है। गोपी की सबसे बडी विशेषता है विरह की भावना जब तक जीवन में विषाद नहीं आयेगा तब तक परामात्मा के स्वरूप का बोध नहीं होगा। परमात्मा ही हमारे विषाद को प्रसाद रूप में परिवर्तित कर देते हैं। आगे कथा में आपने कहा कि जीवन में जब कभी परेशानी आती है तो वह समाप्त भी हो जाती है।
जिस प्रकार समुद्र में लहरें उठती हैं तो वह भी समाप्त हो जाती है। जब हमें जीवन में कोई दुख या परेशानी आये तो हमें ईश्वर के चरणों में नतमस्तक हो जाना चाहिये या अपने गुरू के चरणों में जाना चाहिये। अपनी परेशानी संसार से न कह गुरू या ईश्वर से कहें वहीं आपके दुखों का निदान करेंगे। जब अर्जुन के जीवन में विषाद आया तो उन्होंने भगवान श्री कृष्ण को चुना जगत को नहीं। आगे आपने गोकर्ण की कथा के माध्यम से भागवत का महत्व बताते हुये कहा कि,भगवान के शरणागत हो जाना ही भागवत है।
इस आयोजन का शुभारंभ के अवसर पर शामिल जन सैलाब देखने को मिला, जिसमें महिलाओं ने केसरी वस्त्र धारण कर कलश यात्रा निकाली, वहीं पुरूष वर्ग ने सफेद वस्त्र धारण कर धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो के नारे लगाते हुये नगर के विभिन्न मार्गों से होते हुये कथा स्थल पर पहुंचे। रथ पर विराजमान कथावाचक स्वामी प्रज्ञानानंद जी महाराज ने सभी धर्मावलंबियों को अपना आशीर्वाद देते हुये इस आयोजन को सफल बनाने की अपील की।






