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इस लोक और परलोक में वैभव प्रदान करने वाली है वरूथनी एकादशी

पुण्य फलदायी है वरूथनी एकादशी, इस वर्ष तीन शुभ योगो में आ रही है वरूथनी एकादशी

वरुथिनी एकादशी वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को कहते हैं। वरूथनी एकादशी धार्मिक मान्यता रखने वालों के लिये बहुत खास होती है । इस एकादशी के दिन व्रत और दान से इस लोक में सुख संपदा और एश्वर्य की प्राप्ति के साथ परलोक में भी सुख की प्राप्ति का महत्व बताया गया है ।
वरुथिनी एकादशी पर सूर्योदय के पूर्व उठकर तीर्थ या पवित्र नदियों में स्नान का महत्व है परंतु यदि तीर्थ या पवित्र नदियों में पहुँचना संभव नहीं है तो इसके लिए घर में ही स्नान करने वाले जल में गंगाजल या नर्मदा जल की दो बूंद डालकर कर स्नान कर व्रत और दान करने का संकल्प लेने का विधान है ।
इस वर्ष वरूथनी एकादशी 4 मई को है। यह भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए शुभ अवसर माना जाता है। हालांकि बतया गया है कि वैशाख मास भगवान विष्णु और उनके अवतारों की पूजा के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। इसलिए इस मास में पडऩे वाली एकादशी का महत्व भी बहुत खास होता है। मान्यता है कि धन की कमी को पूरा करने के लिए वरुथिनी एकादशी का व्रत करने से बहुत लाभ होता है। वरुथिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु के वराह स्वरूप की पूजा की जाती है।
इस साल वरुथिनी एकादशी के दिन त्रिपुष्कर योग, इंद्र योग और वैधृति योग बनने से यह तिथि और भी शुभ मानी जा रही है। समस्त दुख और कष्ट से मुक्ति पाने के लिए इस व्रत को किया जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु के साथ माता लक्ष्मी की भी आराधना करने से आपको भगवान लक्ष्मीनारायण का आशीर्वाद मिलता है। स्वयं भगवान वासुदेव ने अर्जुन को इस व्रत का महात्म्य बताया था। ‘वरुथिनीÓ के व्रत से ही मान्धाता तथा धुन्धुमार आदि अन्य अनेक राजा स्वर्गलोक को प्राप्त हुए हैं । शास्त्रों में लिखा है कि जो फल दस हजार वर्ष की तपस्या के बाद मिलता है वह फल वरूथनी एकादशी व्रत करने से प्राप्त होता है ।

इस पवित्र तिथि पर मिट्टी के घड़े को पानी से भरकर उसमें औषधियां और कुछ सिक्के डालकर उसे लाल रंग के कपड़े से बांध देना चाहिए। फिर भगवान विष्णु और उसकी पूजा करनी चाहिए। इसके बाद उस घड़े को किसी विष्णु मंदिर में दान कर देना चाहिए। इस दिन से अनेक मटके रखकर प्यासों को पानी पिलाने जैसा शुभ कार्य भी किया जा सकता है जिसका अनंत गुना पुण्य और आत्मिक संतोष प्राप्त होता है ।

श्रेष्ठ दान का फल देती है वरुथिनी एकादशी

वरुथिनी एकादशी पर व्रत करने वाले को अच्छे फल की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि इस व्रत को धारण करने से इस लोक के साथ परलोक में भी सुख की प्राप्ति होती है।
भगवान वासुदेव ने युधिष्ठिन को व्रत का महत्व बताते हुये कहा था कि राजन घोड़े के दान से हाथी का दान श्रेष्ठ है । भूमिदान उससे भी बड़ा है । भूमिदान से भी अधिक महत्त्व तिलदान का है । तिलदान से बढ़कर स्वर्णदान और स्वर्णदान से बढ़कर अन्नदान है, क्योंकि देवता, पितर तथा मनुष्यों को अन्न से ही तृप्ति होती है । विद्वान पुरुषों ने कन्यादान को भी इस दान के ही समान बताया है । कन्यादान के तुल्य ही गाय का दान है, यह साक्षात् भगवान का कथन है । इन सब दानों से भी बड़ा विद्यादान है । मनुष्य ‘वरुथिनी एकादशीÓ का व्रत करके विद्यादान का भी फल प्राप्त कर लेता है । जो लोग पाप से मोहित होकर कन्या के धन से जीविका चलाते हैं, वे पुण्य का क्षय होने पर यातनामक नरक में जाते हैं । अत: सर्वथा प्रयत्न करके कन्या के धन से बचना चाहिए उसे अपने काम में नहीं लाना चाहिए । जो अपनी शक्ति के अनुसार अपनी कन्या को आभूषणों से विभूषित करके पवित्र भाव से कन्या का दान करता है, उसके पुण्य की संख्या बताने में चित्रगुप्त भी असमर्थ हैं । ‘वरुथिनी एकादशीÓ करके भी मनुष्य उसीके समान फल प्राप्त करता है ।
अत: पापभीरु मनुष्यों को पूर्ण प्रयत्न करके इस एकादशी का व्रत करना चाहिए । यमराज से डरनेवाला मनुष्य अवश्य ‘वरुथिनी एकादशीÓ का व्रत करे । राजन् ! इसके पढऩे और सुनने से सहस्र गौदान का फल मिलता है और मनुष्य सब पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है ।

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