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शूलपानी की झड़ी की ओर पहली चुनौतीपूर्ण चढ़ाई – नर्मदा परिक्रमा

नर्मदा साइकिल परिक्रमा: तप, त्याग और यात्रा -भाग 8

“परिक्रमा अहंकार से नहीं, माँ के चरणों में समर्पण से होती है”

“नर्मदे हर!”

आज की सुबह कुछ विशेष थी।
सिद्धेश्वर हनुमान

शूलपानी की झड़ी और कुली गाँव की माँ जैसी ममता
शूलपानी की झड़ी की ओर पहली चुनौतीपूर्ण चढ़ाई

मंदिर, बड़वानी में पूजन और नमन के बाद माँ नर्मदा की परिक्रमा का अगला चरण शुरू हुआ — एक ऐसा मार्ग जिसे “शूलपानी की झड़ी” कहा जाता है।
नाम में ही चेतावनी थी — यह आसान नहीं होने वाला।

प्रेम की चाय और पहला संकेत

मंदिर में ही भक्तों ने स्नेहपूर्वक चाय पिलाई। वहीं एक सज्जन ने हमें बड़वानी से निकलने वाले तीन परिक्रमा मार्ग बताए और पूछा:

“आप किस रास्ते से जाना चाहेंगे?”

हमने लखनगिरी बाबा के आश्रम वाले मार्ग को चुना — एक तपस्वी, जिनका नाम ही आस्था का प्रतीक है।
हमें साइकिल से यात्रा करते देख वे चकित थे, पर उन्होंने विस्तार से मार्गदर्शन दिया।

पहाड़ी रास्ता और फक्कड़ बाबा

जैसे ही बड़वानी की सीमा पार की, हरियाली से घिरे पहाड़ों और पतली चढ़ाई-उतराई वाली सड़क ने हमारा स्वागत किया।
एक मोड़ पर मिले एक फक्कड़ बाबा — उज्जैन से परिक्रमा पर निकले।

शूलपानी की झड़ी और कुली गाँव की माँ जैसी ममता
पहाड़ी रास्ता और फक्कड़ बाबा

हमने कहा:
“हम 50 दिनों में पूरी करेंगे!”

वे मुस्कराए:
“तुम कौन होते हो दिन तय करने वाले? परिक्रमा अहंकार से नहीं, समर्पण से होती है।”

उनकी बात उस समय हल्की लगी — पर सच वही निकली।

भवति गाँव — पहला झटका

30 किमी के बाद भवति गाँव पहुँचे। आश्रम में प्रसाद मिला।
कुछ सेवकों ने साइकिल देख कहा:

“यह रास्ता साइकिल के योग्य नहीं। लौट जाओ!”

पर हम ठाने हुए थे — माँ नर्मदा का नाम लिया और आगे बढ़ चले।

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बीहड़ का प्रारंभ और कुली गाँव की ममता

रास्ता अब कच्चा था — पगडंडी, ऊँची चढ़ाई, कंकरीले पत्थर।
साइकिल अब बोझ बन गई थी।

हर आने-जाने वाला कहता:
“गलत रास्ते पर हो, आगे लूट होती है!”

प्यास, थकान और भय के बीच एक छोटी कन्या ने घर बुलाया।

यह था कुली गाँव

शूलपानी के बीहड़ में अंतिम मानव बस्ती।

घर की बुज़ुर्ग माता जी ने बताया:
“यह गाँव कभी लुटेरों का ठिकाना था, पर लखनगिरी बाबा के प्रयासों से बदल गया।”
उन्होंने आग्रह किया:
“आज यहीं रुक जाओ।”

हम सहमत हो गए।

रात्रि में वही घर, वही माँ —
मूँग की दाल, बाजरे की रोटी, और एक माँ जैसा स्नेह।

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परिक्रमा का प्रथम गूढ़ पाठ

उस रात हमने पहली बार सीखा:
 परिक्रमा संकल्प से नहीं, समर्पण से होती है।
 माँ की कृपा, सही राह की पहचान देती है।

अगला पड़ाव: लखनगिरी बाबा का आश्रम

क्या हुआ जब हम पहुँचे उस सिद्ध संत के पावन धाम?
कैसी अनुभूति मिली उन वनों के मध्य?

जानिए अगले भाग में…

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