392 अधिकारी-कर्मचारियों पर कार्रवाई की खबर, 80 से अधिक ठेकेदारों-सप्लायर्स पर शिकंजा कसने की जानकारी; फिर सिवनी नगरपालिका के कथित महंगे सौदों की जांच कब? प्रस्ताव निरस्त कर देना काफी नहीं, पुराने भुगतान और खरीदी की पड़ताल भी जरूरी।सिवनी यशो:- भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई के दावे बहुत सुने, सरकारी धन की लूट पर भाषण भी बहुत सुने, लेकिन अब सवाल भाषणों का नहीं, कार्रवाई का है। मध्यप्रदेश में नगरीय निकायों की खरीदी में अनियमितताओं के मामलों पर कार्रवाई की जानकारी सामने आ रही है। विभागीय स्तर पर 392 अधिकारी-कर्मचारियों के विरुद्ध कार्रवाई और 80 से अधिक ठेकेदारों-सप्लायर्स पर कार्रवाई किए जाने की बात कही गई है। ऐसे में सिवनी की जनता पूछ रही है—जब प्रदेश में कार्रवाई हो सकती है, तो सिवनी नगरपालिका के कथित महंगे सौदों की जांच आखिर कब होगी?क्या सिवनी नगरपालिका कोई ऐसा क्षेत्र है, जहां लाखों-करोड़ों रुपये के प्रस्तावों पर सवाल तो उठें, लेकिन जवाबदेही तय करने की नौबत न आए? क्या जनता के पैसे का हिसाब मांगने के लिए भी किसी बड़े आदेश का इंतजार करना पड़ेगा? और यदि खरीदी में कोई अनियमितता नहीं हुई, तो संबंधित अधिकारी पूरी लागत और बाजार दरों का तुलनात्मक विवरण सामने रखकर स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं करते?40 लाख की मोटर के लिए 77 लाख का प्रस्ताव! यह कैसा हिसाब?नगरपालिका परिषद की 22 अक्टूबर 2026 की बैठक में 240 एचपी मोटर की खरीदी के लिए 77 लाख रुपये का प्रस्ताव सामने आया। उपलब्ध जानकारी में इस क्षमता की नई मोटर की अनुमानित कीमत 35 से 40 लाख रुपये के आसपास बताई जा रही है। तकनीकी विशिष्टताओं, पंप, कॉलम पाइप, कंट्रोल पैनल, केबल, वाल्व और इंस्टॉलेशन के कारण कुल लागत में अंतर संभव है। लेकिन यही तो असली सवाल है—77 लाख रुपये की राशि किस आधार पर तय की गई?क्या बाजार दरों की तुलना की गई थी? कितने कोटेशन लिए गए? मोटर और उससे जुड़े उपकरणों की अलग-अलग कीमत क्या थी? इंस्टॉलेशन और अन्य खर्च कितने थे? क्या लागत का तकनीकी परीक्षण हुआ था?यदि प्रस्तावित कीमत उचित थी, तो पूरा हिसाब सार्वजनिक किया जाए। यदि दरों का आकलन किए बिना प्रस्ताव तैयार किया गया, तो उसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। जनता की गाढ़ी कमाई कोई ऐसी रकम नहीं है, जिसे बिना स्पष्ट औचित्य के किसी भी प्रस्ताव के हवाले कर दिया जाए।77 लाख रुपये का प्रस्ताव अपने आप में भ्रष्टाचार का प्रमाण नहीं, लेकिन इतनी बड़ी राशि और बताई जा रही अनुमानित कीमत के बीच अंतर की निष्पक्ष जांच होना जरूरी है।दो मोटरों की मरम्मत पर 46 लाख! खराबी का हिसाब कौन देगा?जल प्रदाय व्यवस्था में लगी दो मोटरों के सुधार के लिए प्रस्ताव क्रमांक 12 और 13 में लगभग 22 लाख तथा 24 लाख रुपये की मरम्मत राशि सामने आई। दोनों को मिलाकर 46 लाख रुपये का खर्च प्रस्तावित था।अब जनता यह जानना चाहती है कि दोनों मोटरों में आखिर ऐसी कौन-सी खराबियां थीं, जिनके सुधार के लिए इतनी बड़ी राशि की जरूरत पड़ी? मरम्मत का एस्टीमेट किसने बनाया? तकनीकी परीक्षण किसने किया? नई मशीन खरीदने और पुरानी मशीन की मरम्मत कराने की लागत की तुलना हुई या नहीं?नगरपालिका को मरम्मत के नाम पर प्रस्तावित प्रत्येक रुपये का तकनीकी आधार देना होगा। यदि मरम्मत जरूरी थी तो उसका पूरा विवरण सामने आए, और यदि खर्च का आकलन बाजार दरों से मेल नहीं खाता, तो उसकी जांच हो।यह पेयजल व्यवस्था का मामला है। जनता को पानी उपलब्ध कराना नगरपालिका की जिम्मेदारी है। इस जिम्मेदारी की आड़ में खर्चों पर उठने वाले सवालों को अनदेखा नहीं किया जा सकता।प्रस्ताव तो गिर गए, अब पुराने सौदों की बारी!22 अक्टूबर की परिषद बैठक में छह चक्का गार्बेज वाहन के लिए 39 लाख रुपये, पांच ई-टिपर वाहनों के लिए 45 लाख रुपये, डोर-टू-डोर कचरा संग्रहण के वार्षिक ठेके के लिए 3 करोड़ 68 लाख रुपये, दो वर्टिकल टरबाइन पंपों की मरम्मत के लिए 46 लाख रुपये और 240 एचपी मोटर के लिए 77 लाख रुपये सहित कई प्रस्तावों पर सवाल उठे।उपलब्ध जानकारी के अनुसार, विरोध के बाद संबंधित प्रस्ताव सर्वसम्मति से निरस्त कर दिए गए। स्थानीय स्तर पर यह भी बताया गया कि पार्षदों की आपत्तियों और मीडिया में उठे सवालों के बाद भाजपा संगठन ने बैठक कर मामले पर चर्चा की।यह अच्छी बात है कि जिन प्रस्तावों पर गंभीर सवाल उठे, उन्हें आगे नहीं बढ़ाया गया। लेकिन सवाल यह है कि क्या प्रस्ताव निरस्त होने से नगरपालिका की सारी जिम्मेदारी समाप्त हो गई?बिल्कुल नहीं!पहले खरीदे गए ट्रैक्टर, टैंकर, चलित शौचालय, फाइबर के पेशाबघर, जेसीबी, डस्टबिन, झाड़ू, कीटनाशक पाउडर, एलम, ब्लीचिंग पाउडर, मोटर, वाल्व और अन्य सामग्री की खरीद का भी हिसाब होना चाहिए। जरूरत कितनी थी, सामग्री कितनी खरीदी गई, दरें क्या थीं, भुगतान कितना हुआ और सामान वास्तव में उपलब्ध है या नहीं—इन सभी सवालों का जवाब दस्तावेजों से मिलना चाहिए।यदि पुरानी खरीदी में कोई गड़बड़ी नहीं हुई, तो जांच में यह साफ हो जाएगा। यदि अनियमितता हुई है, तो केवल प्रस्ताव निरस्त करने से जिम्मेदार लोगों को राहत नहीं मिलनी चाहिए।प्रदेश में 392 पर कार्रवाई, सिवनी में जांच का इंतजार क्यों?नगरीय प्रशासन विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय दुबे के बयानों के अनुसार, प्रदेश में अलग-अलग स्तर के 392 अधिकारी-कर्मचारियों के विरुद्ध कार्रवाई की जा चुकी है। इनमें 135 सीएमओ स्तर के अधिकारी शामिल बताए गए हैं। सात अधिकारी-कर्मचारियों की बर्खास्तगी, 3 से 4 करोड़ रुपये की वसूली और 80 से अधिक ठेकेदारों-सप्लायर्स के विरुद्ध कार्रवाई की जानकारी भी सामने आई है। इन आंकड़ों की आधिकारिक अभिलेखों से पुष्टि की जानी चाहिए।यदि प्रदेश में सरकारी खरीदी और अनियमितताओं के मामलों में कार्रवाई हो रही है, तो सिवनी नगरपालिका में उठे सवालों को भी उसी गंभीरता से देखा जाना चाहिए।क्या सिवनी में नियम अलग हैं? क्या यहां की खरीदी बाजार दरों से तुलना के दायरे में नहीं आती? क्या शिकायतों पर जांच बैठाना किसी की मर्जी पर निर्भर है?जांच का मतलब किसी को पहले से अपराधी घोषित करना नहीं है। जांच का मतलब है—सच्चाई सामने लाना, जिम्मेदारी तय करना और सरकारी धन सुरक्षित रखना। यदि आरोप गलत हैं, तो तथ्य सामने आएं। यदि गड़बड़ी प्रमाणित होती है, तो कानून के अनुसार कार्रवाई हो।कांग्रेस ने उठाए सवाल, अब प्रशासन जवाब देजिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष नरेश मरावी ने 24 अक्टूबर 2026 की प्रेस विज्ञप्ति में सिवनी नगरपालिका सहित छपारा, लखनादौन, केवलारी और बरघाट के नगरीय निकायों में सामग्री की कथित तौर पर अधिक दरों पर खरीदी के आरोप लगाए हैं। उन्होंने जिला कलेक्टर से बाजार मूल्य से तुलना कर जांच कराने और दोषी पाए जाने वालों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की मांग की है।ये गंभीर आरोप हैं और इनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। केवल इसलिए शिकायत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि आरोप किसी राजनीतिक दल ने लगाए हैं। जनता के पैसे की सुरक्षा किसी पार्टी का मुद्दा नहीं, प्रशासन की जिम्मेदारी है।जिला प्रशासन को निविदा दस्तावेजों, जेम पोर्टल की दरों, तुलनात्मक कोटेशन, तकनीकी स्वीकृतियों, आपूर्ति आदेशों, स्टॉक रजिस्टर, गुणवत्ता परीक्षण और भुगतान अभिलेखों की जांच करानी चाहिए। जरूरत पड़ने पर स्वतंत्र तकनीकी विशेषज्ञों से लागत का आकलन कराया जाना चाहिए।यदि सरकारी धन के दुरुपयोग के प्रमाण मिलते हैं, तो नियमानुसार वसूली, विभागीय कार्रवाई और पर्याप्त साक्ष्य होने पर आपराधिक प्रकरण दर्ज करने की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए। दोष सिद्ध होने पर कानून के अनुसार दंड मिलना चाहिए।ईमानदारी की बातें नहीं, अब परिणाम चाहिए!नगरपालिका जनता से जुड़े बुनियादी काम करती है। सड़क, सफाई, पेयजल और अन्य सुविधाओं के लिए खर्च होने वाला प्रत्येक रुपया जनता की मेहनत की कमाई है। इस धन का हिसाब मांगना किसी के खिलाफ व्यक्तिगत अभियान नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिक का अधिकार है।यदि कोई अधिकारी, कर्मचारी, ठेकेदार या सप्लायर नियमों को तोड़कर सरकारी धन को नुकसान पहुंचाता है, तो उसे कानून के मुताबिक जवाबदेह बनाया जाना चाहिए। पद, पहचान, राजनीतिक निकटता या प्रभाव किसी को जांच से ऊपर नहीं रख सकते।भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई की असली परीक्षा बड़े-बड़े दावों में नहीं, बल्कि उन मामलों में होती है जहां सवाल उठने के बाद जांच होती है, तथ्य सामने आते हैं, वसूली की जाती है और दोषियों को दंड मिलता है।कहीं तो बख्शों भ्रष्टाचारियों! सिवनी को जवाब चाहिएदैनिक यशोन्नति का सीधा सवाल जिला प्रशासन और नगरपालिका के जिम्मेदार अधिकारियों से है—77 लाख रुपये की मोटर का लागत विवरण सार्वजनिक कब होगा? दो पंपों की 46 लाख रुपये की प्रस्तावित मरम्मत का तकनीकी परीक्षण कब होगा? पहले खरीदी गई सामग्री की दरों और भुगतान की जांच कब शुरू होगी? शिकायतों पर निर्णय लेने की समयसीमा क्या है? और यदि किसी स्तर पर भ्रष्टाचार प्रमाणित होता है, तो जिम्मेदार लोगों पर कानूनी कार्रवाई कब होगी?प्रस्ताव निरस्त हो गए, लेकिन जांच का सवाल अभी जिंदा है। लाखों-करोड़ों के खर्च पर सवाल उठे हैं, तो हिसाब भी सार्वजनिक होना चाहिए।प्रदेश में अनियमितताओं पर कार्रवाई की जा रही है, तो सिवनी को अछूता क्यों रखा जाए? यहां भी निष्पक्ष जांच हो, दस्तावेज सार्वजनिक हों, जिम्मेदारी तय हो और दोष सिद्ध होने पर कानून के मुताबिक कार्रवाई होजनता के पैसे का हिसाब मांगना बंद नहीं होगा। कथित भ्रष्टाचार के हर मामले में सवाल पूछे जाएंगे, जांच की प्रगति पर नजर रखी जाएगी और जब तक सच्चाई सामने नहीं आती, जवाबदेही की मांग जारी रहेगी।क्योंकि जनता का पैसा किसी की निजी जागीर नहीं है और सरकारी कुर्सी किसी को मनमानी का लाइसेंस नहीं