EXCLUSIVE | 322 पदों की मल्टीटास्क भर्ती में ‘मल्टीपल गेम’ का संदेह! चयन, तैनाती, वेतन और सरकारी भुगतान की पूरी व्यवस्था जांच के घेरे में
सीएमएचओ के कार्यादेश से शुरू हुई पड़ताल में सामने आए कई सवाल; रिश्तेदारों की नियुक्ति, महीनों तक वेतन नहीं, कागजी तैनाती और अनुबंध अवधि के बाद की प्रक्रिया की भी हो रही जांच।
सिवनी मल्टीटास्क भर्ती जांच
दस्तावेजों में आउटसोर्स व्यवस्था, शिकायतों में गुमराह कर भर्ती, विभागीय भूमिका और सार्वजनिक धन के उपयोग की जांच; जबलपुर संभाग स्तर पर पड़ताल जारी
Seoni, 04 August 2026
सिवनी यशो:- जिले के स्वास्थ्य विभाग में वर्ष 2025 में आउटसोर्स व्यवस्था के तहत की गई मल्टी टॉस्क वर्कर (ग्रुप-डी) भर्ती अब केवल भर्ती विवाद नहीं रह गई है। यह मामला अब भर्ती प्रक्रिया, सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के संचालन, सार्वजनिक धन के उपयोग, उपस्थिति सत्यापन, वेतन भुगतान और विभागीय जवाबदेही तक पहुंच गया है।
प्रारंभ में कर्मचारियों के महीनों तक वेतन नहीं मिलने की शिकायत सामने आई थी, लेकिन जांच आगे बढ़ने के साथ कई ऐसे तथ्य सामने आ रहे हैं जिन्होंने पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
शिकायतों के अनुसार भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता, एक ही परिवार के अनेक सदस्यों की नियुक्ति, कुछ विभागीय कर्मचारियों की कथित भूमिका, अभ्यर्थियों को भर्ती की वास्तविक प्रकृति से अनभिज्ञ रखने, स्वीकृत पदों से अधिक नियुक्तियों, कुछ स्थानों पर केवल अभिलेखों में तैनाती दिखाए जाने तथा अनुबंध अवधि समाप्त होने के बाद की व्यवस्थाओं जैसे अनेक बिंदु जांच के केंद्र में हैं। पूरे मामले की जांच संयुक्त संचालक, स्वास्थ्य सेवाएं, जबलपुर संभाग के स्तर पर चल रही है।
दस्तावेजों से शुरू होती है पूरी कहानी
सीएमएचओ कार्यालय सिवनी द्वारा जारी कार्यादेश के अनुसार 15 जुलाई 2025 से मृत्युंजय ट्रेडर्स, इंदौर को जिले की स्वास्थ्य संस्थाओं में 322 मल्टी टॉस्क वर्कर (ग्रुप-डी) उपलब्ध कराने का दायित्व सौंपा गया था। यह कार्यादेश 365 दिनों के लिए था।
कार्यादेश राज्य स्वास्थ्य समिति द्वारा निर्धारित आईपीएचएस (IPHS) मानकों तथा स्वास्थ्य संचालनालय भोपाल के निर्देशों के आधार पर जारी किया गया था।
इसके अनुसार—
- 35 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में एक-एक मल्टी टॉस्क वर्कर।
- 287 उप स्वास्थ्य केंद्र/हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर में एक-एक मल्टी टॉस्क वर्कर।
अर्थात जिले की स्वास्थ्य संस्थाओं में कुल 322 कर्मचारियों की व्यवस्था की जानी थी।
कार्यादेश की शर्तें स्पष्ट थीं, अब उन्हीं पर उठ रहे हैं सवाल
सीएमएचओ द्वारा जारी कार्यादेश में एजेंसी के लिए स्पष्ट जिम्मेदारियां तय की गई थीं।
इनमें प्रमुख रूप से—
- नियुक्ति निर्धारित अर्द्धकुशल दर पर होगी।
- प्रत्येक कर्मचारी का पुलिस सत्यापन अनिवार्य होगा।
- प्रत्येक माह संबंधित बीएमओ उपस्थिति प्रमाणित करेंगे।
- उसी उपस्थिति के आधार पर भुगतान होगा।
- ईपीएफ, ईएसआईसी, जीएसटी सहित सभी वैधानिक दायित्व एजेंसी के होंगे।
- अनुबंध अवधि 365 दिन रहेगी।
यानी दस्तावेजों के अनुसार भर्ती से लेकर उपस्थिति और भुगतान तक की पूरी प्रक्रिया निर्धारित थी।
अब जांच का सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या इन सभी शर्तों का वास्तव में पालन हुआ?
वेतन नहीं मिला तो खुलने लगी भर्ती की परतें
सूत्रों के अनुसार बड़ी संख्या में कर्मचारियों को छह से आठ महीने तक वेतन नहीं मिला।
इसी के बाद कर्मचारियों ने जानकारी जुटाना शुरू किया तो भर्ती प्रक्रिया को लेकर भी सवाल सामने आने लगे।
शिकायतों में कहा गया कि अनेक अभ्यर्थियों को भर्ती की वास्तविक प्रकृति स्पष्ट नहीं बताई गई। उन्हें यह विश्वास दिलाया गया कि उन्हें सरकारी व्यवस्था में स्थायी प्रकृति की नौकरी मिल रही है। कुछ शिकायतों में आर्थिक लेन-देन के आरोप भी लगाए गए हैं। हालांकि इन आरोपों की पुष्टि अभी जांच के बाद ही हो सकेगी।
यदि भर्ती कंपनी कर रही थी, तो विभागीय कर्मचारियों के नाम क्यों?
यही इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न माना जा रहा है।
आउटसोर्स व्यवस्था में नियुक्ति का अधिकार एजेंसी के पास था।
इसके बावजूद शिकायतों में आरोप है कि विभाग से जुड़े कुछ कर्मचारियों ने अपने प्रभाव का उपयोग कर अपने परिचितों और रिश्तेदारों के आवेदन आगे बढ़वाए तथा कुछ मामलों में पसंदीदा स्थानों पर पदस्थापना कराने तक भूमिका निभाई।
यदि जांच में इस प्रकार का कोई हस्तक्षेप प्रमाणित होता है तो प्रश्न केवल एजेंसी पर नहीं, बल्कि पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया पर भी खड़ा होगा।
एक परिवार से दो नहीं, चार-चार नियुक्तियों की शिकायत
जांच में जिन नियुक्तियों की चर्चा प्रमुखता से हो रही है, उनमें—
- लखनादौन विकासखंड के सिरोलीपार और पुरवामाल।
- नागनदेवरी और खूंटखमरिया।
- घंसौर विकासखंड के दिवारी, खमारा, बरेला और पाटन।
यहां एक ही परिवार के दो-दो और चार-चार सदस्यों की नियुक्ति होने की शिकायतें सामने आई हैं।
यद्यपि कानून किसी परिवार के एक से अधिक सदस्यों को नियुक्ति से नहीं रोकता, लेकिन जब चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता पर प्रश्न हों तो ऐसे मामलों की जांच स्वाभाविक हो जाती है।
क्या कुछ नियुक्तियां केवल कागजों में थीं?
जांच से जुड़े सूत्रों के अनुसार सबसे गंभीर बिंदुओं में से एक यह भी है कि कुछ हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर (आरोग्य मंदिर) और कुछ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में जिन कर्मचारियों की नियुक्ति अभिलेखों में दर्ज है, उनमें से कुछ के मौके पर कार्यरत नहीं होने की जानकारी जांच दल तक पहुंची है।
यदि यह तथ्य सही पाया जाता है तो प्रश्न केवल भर्ती तक सीमित नहीं रहेगा।
ऐसी स्थिति में जांच को यह भी देखना होगा—
- उपस्थिति किस आधार पर प्रमाणित हुई?
- बीएमओ ने सत्यापन कैसे किया?
- वेतन भुगतान के बिल किस आधार पर बने?
- यदि कर्मचारी कार्यरत नहीं था तो सार्वजनिक धन का भुगतान किस प्रक्रिया से हुआ?
यही कारण है कि अब जांच भर्ती से आगे बढ़कर उपस्थिति, भुगतान और सरकारी धन के उपयोग तक पहुंच गई है।
अनुबंध खत्म, अब नए सवाल
कार्यादेश के अनुसार एजेंसी का अनुबंध 15 जुलाई 2025 से 365 दिनों के लिए था, जिसकी अवधि 14 जुलाई 2026 को समाप्त हो चुकी है।
अब जांच का एक और महत्वपूर्ण बिंदु यह है—
- क्या अनुबंध का विधिवत विस्तार हुआ?
- यदि हुआ तो आदेश कहां है?
- यदि नहीं हुआ तो उसके बाद कार्य किस आधार पर चला?
- क्या अनुबंध समाप्त होने के बाद भी भुगतान या कार्य जारी रहा?
जांच जिन बिंदुओं पर केंद्रित है
- क्या भर्ती कार्यादेश के अनुरूप हुई?
- क्या केवल 322 स्वीकृत पदों पर ही नियुक्तियां हुईं?
- क्या कहीं पद संख्या बढ़ाई गई?
- क्या विभागीय कर्मचारियों ने प्रक्रिया को प्रभावित किया?
- क्या कुछ नियुक्तियां केवल अभिलेखों तक सीमित थीं?
- क्या उपस्थिति सत्यापन नियमानुसार हुआ?
- क्या वेतन भुगतान में अनियमितता हुई?
- क्या अनुबंध समाप्त होने के बाद भी प्रक्रिया जारी रही?
क्या कहते हैं जिम्मेदार?
प्रशासनिक अधिकारी मनोज बुनकर ने बताया कि भर्ती संबंधी शिकायत प्राप्त हुई है। संस्था से आवश्यक दस्तावेज जांच के लिए बुलाए गए हैं। वेतन भुगतान सहित पूरे मामले की जांच की जा रही है। जांच पूरी होने के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी।
(दैनिक यशोन्नति की विशेष पड़ताल)
नोट: इस रिपोर्ट में उल्लिखित अनियमितताओं से संबंधित कई बिंदु शिकायतों, उपलब्ध दस्तावेजों और जांच से जुड़े सूत्रों पर आधारित हैं। इनकी अंतिम पुष्टि विभागीय जांच रिपोर्ट के बाद ही होगी।
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