न्यू कर्माझिरी विस्थापन में खुले भ्रष्टाचार के पिटारे: वन संपदा की लूट, लकड़ी गायब, अधिकारी मौन
वन संरक्षण के नाम पर सरकारी संपत्ति का तांडव—सागौन प्लांटेशन की अवैध कटाई, 500 से ज़्यादा चठ्ठे गायब, विभागीय संरक्षण में चलता वन माफिया सिंडीकेट
Seoni 24 November 2025
सिवनी यशो :- पेंच नेशनल पार्क के कोर एरिया से ग्राम कर्माझिरी को विस्थापित किए जाने का शासन का निर्णय वन्यजीव संरक्षण एवं मानव सुरक्षा की दृष्टि से निश्चय ही सराहनीय हो सकता है, लेकिन इस नेक पहल को कुछ जिम्मेदार अधिकारियों ने भ्रष्टाचार का अड्डा बना दिया है। न्यू कर्माझिरी ग्राम बसाहट के नाम पर बड़े पैमाने पर वन भूमि, लकड़ी और राजस्व की संगठित हेराफेरी के गंभीर आरोप सामने आ रहे हैं।
शासन की योजना के अनुसार ग्राम कर्माझिरी को ग्राम जोगीवाड़ा स्थित वन विभाग के कक्ष क्रमांक आर/436 एवं आर/437 में बसाने हेतु 197 हेक्टेयर वन भूमि निर्धारित की गई थी। इस बसाहट के लिए वन क्षेत्र को समतल करने के नाम पर दक्षिण वन मंडल सिवनी एवं उत्पादन वन मंडल सिवनी द्वारा बड़े पैमाने पर वृक्षों की कटाई की गई।
❗लेकिन यहीं से शुरू हुआ भ्रष्टाचार का खेल
जून माह के प्रथम पखवाड़े में कटे पेड़ों से तैयार हुई लाखों रुपये कीमत की लकड़ी की ‘फाइनल निकासी’ तो रिकॉर्ड में दर्ज की गई,
लेकिन करीब 500 से अधिक जलाऊ लकड़ी के चठ्ठे रिकॉर्ड में दर्ज होने के बावजूद मौके पर पूरी तरह गायब बताये जा रहे हैं।
नियम अनुसार यह शेष सामग्री क्षेत्रीय वन मंडल को सौंपी जानी थी, लेकिन वह आज तक गायब है।
विभागीय अधिकारियों तक प्रमाण पहुँचने के बावजूद किसी भी दोषी पर कार्रवाई नहीं हुई।
सूत्रों के अनुसार —
“इन चठ्ठों की पूर्ति के लिए फाइनल निकासी के बाद भी नदी-नालों के किनारे अवैध कटाई करवाई जा रही है,
रेंजर और उच्च अधिकारी छोटे कर्मचारियों पर दबाव डाल रहे हैं कि नए पेड़ काटकर रिकॉर्ड मिलान किया जाए।
जबकि रिकॉर्ड के चठ्ठे गायब होने की जिम्मेदारी दक्षिण वन मंडल के एसडीओ पर तय होती है, लेकिन उन्हें उच्च स्तरीय संरक्षण प्राप्त है।”
🌲 सागौन प्लांटेशन की कटाई में भी बड़ा खेल!
साढ़े चार सौ एकड़ क्षेत्र की कटाई में केवल 1200 बल्लियाँ ही जमा कराई गईं,
जबकि इस प्लांटेशन में सागौन और बाँस की भारी मात्रा मौजूद थी।
बाँस भी समिति के माध्यम से नाममात्र कीमत में निपटा दिया गया।
सागौन की कटाई उत्पादन वन मंडल के रेंजर आर.के. कर्वेती द्वारा कराई गई,
जिन्होंने कटाई के बाद सरकारी मद में केवल 1200 बल्लियाँ जमा कीं —
जबकि हजारों बल्लियाँ क्षेत्र में महीनों तक पड़ी देखी गईं।
विश्वसनीय सूत्र बताते हैं:
“फाइनल निकासी जून में हो गई थी, लेकिन बल्लियाँ महीनों बाद तक गैर कानूनी रूप से क्षेत्र में ढुलवाती रहीं।”
उत्पादन वन मण्डल के एसडीओ एच.आर. वट को इस बारे में सूचना दी गई थी,
लेकिन कार्रवाई तो नहीं की गई, उल्टे वहां मौजूद बल्लियाँ रातोंरात ढुलवा दी गईं।
🔍 विश्वसनीय सूत्रों का बड़ा दावा
“इस पूरे खेल में शामिल कुछ अधिकारी कथित रूप से मुख्य वनसंरक्षक के संरक्षण का लाभ उठाकर
सरकारी संपत्ति का खुलेआम दुरुपयोग, रिकॉर्ड की हेराफेरी और अवैध परिवहन करा रहे हैं।”
विभागीय सूत्र बताते हैं —
“लकड़ी की वास्तविक मात्रा, परिवहन विवरण, स्टॉक रजिस्टर और मुआवज़ा स्वीकृति फाइलों में
संगठित स्तर पर हेराफेरी के ठोस प्रमाण मौजूद हैं,
लेकिन कार्रवाई जानबूझकर रोकी जा रही है।”
🌍 जनता और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का आरोप
🔹 शासन की योजना को भ्रष्टाचार का अवसर बना दिया गया।
🔹 लकड़ी, वनभूमि और भू-राजस्व में लाखों रुपये की हेराफेरी।
🔹 प्रभावशाली अधिकारियों के संरक्षण में दबाया जा रहा मामला।
🔹 यह सिर्फ वन ग्राम विस्थापन नहीं, बल्कि वन संपदा लूट का सुनियोजित मॉडल बन गया है।
निष्कर्ष
शासन की मंशा स्पष्ट है —
👉 वन्यजीव संरक्षण
👉 ग्रामीणों का सम्मानजनक पुनर्वास
👉 मानव-वन संतुलन की सद्भावना
लेकिन कुछ अधिकारियों की मिलीभगत से यह नेक योजना
वन विभाग का सबसे बड़ा घोटाला बनने की ओर बढ़ रही है।
अब सवाल यह है —
क्या शासन स्वतः संज्ञान लेकर कार्रवाई करेगा
या यह फाइल भी भ्रष्टाचार की अलमारी में धूल फांकती रहेगी?



