भाव-अंतर नहीं, भाव चाहिए : हीरा चौकसे
किसान विरोधी नीतियों से अन्नदाता हुआ लाचार — सरकार से उचित मूल्य देने की मांग

Seoni 04 November 2025
सिवनी यशो :- प्रदेश कांग्रेस के पूर्व महासचिव एवं वर्तमान में विधानसभा प्रभारी पश्चिम जबलपुर श्री हीरा चौकसे ने कहा है कि आज देश का अन्नदाता कहलाने वाला किसान भुखमरी की कगार पर है। कर्ज के बोझ और प्राकृतिक आपदाओं की दोहरी मार झेलते हुए किसान अपनी मेहनत की फसल बेचने के बाद भी लागत नहीं निकाल पा रहा है।
उन्होंने कहा कि सरकार किसानों को “भावांतर” का झुनझुना थमाकर गुमराह कर रही है, जबकि ज़रूरत “भावांतर” नहीं बल्कि “उचित भाव” देने की है। सरकार को चाहिए कि प्रदेश के सभी जिलों के किसानों को मक्के का वास्तविक मूल्य प्रदान करे।
🌾 कृषि प्रधान देश में किसान ही सबसे अधिक परेशान
श्री चौकसे ने कहा कि भारत कृषि प्रधान देश है और देश की लगभग 65 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है। इसके बावजूद आजादी के सात दशक बाद भी किसान समृद्ध नहीं हो पाया। सरकार को भलीभांति पता है कि किसान की फसल पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर होती है, और हर वर्ष आने वाली प्राकृतिक आपदाएँ उसकी मेहनत पर पानी फेर देती हैं।
उन्होंने कहा कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कृषि से जुड़े अनेक व्यवसाय ही आय का मुख्य साधन हैं। किसान अपने सीमित संसाधनों में खेती कर अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने की कोशिश करता है, लेकिन शासन की नीतियाँ उसे बार-बार हताश करती हैं
💰 मक्के का समर्थन मूल्य बनाम बाजार मूल्य
श्री चौकसे ने बताया कि सरकार ने भले ही मक्के का समर्थन मूल्य ₹2,460 प्रति क्विंटल घोषित किया है,
परंतु बाजार में किसानों को मात्र ₹1,600–₹1,700 प्रति क्विंटल ही मिल रहा है।
ऐसे में किसान को उसकी लागत तक नहीं मिल पा रही।
भारत सरकार के A2 + FL फार्मूले के अनुसार एक क्विंटल मक्का की लागत ₹1,508 आती है,
जबकि स्वामीनाथन आयोग के C2 + 50% फार्मूले से यह लागत ₹1,952 बैठती है।
इस प्रकार सरकार किसानों को लागत मूल्य के बराबर भी भुगतान नहीं कर पा रही है।
मक्के के आयात की आशंका से और बढ़ा संकट
उन्होंने कहा कि –
मक्के के आयात की आशंका ने बाजार में दाम और नीचे गिरा दिए हैं।
यहां तक कि केंद्रीय कृषि मंत्री के संसदीय क्षेत्र विदिशा में भी मक्के का रेट ₹1,700–₹1,800 प्रति क्विंटल से अधिक नहीं है।
किसानों के लिए स्पष्ट मांग
श्री हीरा चौकसे ने सरकार से कहा —
> “किसानों को भावांतर नहीं, उचित भाव दीजिए। तभी अन्नदाता वास्तव में समृद्ध और सम्मानित बन पाएगा।”



