लखनादौन में भगवान पारसनाथ का मोक्ष कल्याणक महापर्व मनाया
मुनि श्री निर्वेगसागर जी महाराज के ससंघ सानिध्य में अभिषेक, शांतिधारा और निर्वाण कल्याणक का लाडू चढ़ाया; ‘एक्शन करो, रिएक्शन नहीं’ का दिया संदेश
लखनादौन में भगवान पारसनाथ का मोक्ष कल्याणक महापर्व, मुनि निर्वेगसागर ने दिया ‘एक्शन करो, रिएक्शन नहीं’ का संदेश
लखनादौन यशो :- धर्मनगरी लखनादौन में जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान श्री पारसनाथ जी का मोक्ष कल्याणक महापर्व श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ मनाया गया। आचार्य प्रवर श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के आज्ञानुवर्ती शिष्य पाठशाला प्रणेता मुनि श्री 108 निर्वेगसागर जी महाराज ससंघ के सानिध्य में आयोजित धार्मिक कार्यक्रम में समाज के सभी वर्गों के श्रद्धालुओं ने सहभागिता कर धर्मलाभ लिया।
श्री दिगंबर जैन पारसनाथ जिनालय में मूलनायक देवाधिदेव श्री 1008 पारसनाथ भगवान की भूगर्भ से प्राप्त चतुर्थकालीन प्रतिमा का मुकुट सप्तमी के पावन अवसर पर महामस्तकाभिषेक एवं शांतिधारा की गई। इसके पश्चात भगवान पारसनाथ के निर्वाण कल्याणक के अवसर पर श्रद्धालुओं द्वारा भक्तिभाव से निर्वाण कल्याणक का लाडू चढ़ाया गया।
विपरीत परिस्थितियों में समता न छोड़ें
इस अवसर पर मुनि श्री निर्वेगसागर जी महाराज ने अपने मांगलिक प्रवचन में भगवान पार्श्वनाथ के जीवन से प्रेरणा लेने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि जीवन में कितने भी उपसर्ग, विरोध और विपरीत परिस्थितियां आएं, लेकिन समता और आत्मधर्म को कभी नहीं छोड़ना चाहिए।
उन्होंने कहा कि भगवान पार्श्वनाथ ने अनेक भवों में कठिन परिस्थितियों और उपसर्गों को सहन किया, लेकिन कभी प्रतिकार का मार्ग नहीं अपनाया। उन्होंने क्षमा, सहनशीलता, संयम और आत्मबल को धारण किया। वहीं कमठ का जीव बार-बार वैर और कषाय में उलझता रहा। अंततः भगवान पार्श्वनाथ ने अपनी साधना पूर्ण कर मोक्ष पद प्राप्त किया।
‘एक्शन करो, रिएक्शन नहीं’
मुनिश्री ने कहा कि भगवान पार्श्वनाथ के निर्वाण पर हमारी प्रसन्नता इस बात की नहीं है कि प्रभु हमसे दूर चले गए, बल्कि इस बात की है कि जिस परम लक्ष्य के लिए उन्होंने साधना की, उसे उन्होंने प्राप्त कर लिया।
उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रेरणादायी सूत्र देते हुए कहा—“एक्शन करो, रिएक्शन नहीं।” कोई कितना भी बुरा कहे या परिस्थिति कितनी भी विपरीत क्यों न हो, तुरंत प्रतिकार करने के बजाय कुछ क्षण मौन धारण करना चाहिए।
मुनिश्री ने कहा कि एक मिनट का मौन भी व्यक्ति को गलत शब्द, गलत निर्णय और अनावश्यक कर्मबंध से बचा सकता है। जब क्रोध या आवेश आए तो तुरंत उत्तर देने के बजाय एक मिनट रुकें, मौन रहें, विचार करें और फिर उचित कर्म करें। यही सहनशीलता का अभ्यास है।
मौन और धैर्य से मजबूत होता है आत्मबल
उन्होंने कहा कि मौन व्यक्ति को भीतर से मजबूत करता है। जिस परिस्थिति में हम तत्काल प्रतिक्रिया देते हैं, वही परिस्थिति थोड़े धैर्य और विवेक से स्वयं शांत हो सकती है। विपरीत परिस्थितियों में रुकें, मौन रहें, विचार करें और उचित कर्म करें, यही अभ्यास धीरे-धीरे धैर्य, सहनशीलता, विवेक, क्षमा और आत्मबल का विकास करता है।
मुनिश्री ने मंगल भावना व्यक्त करते हुए कहा कि भगवान पार्श्वनाथ के जीवन, तप, संयम और मोक्ष कल्याणक से प्रेरणा लेकर सभी के भीतर ऐसी शक्ति प्रकट हो कि हर परिस्थिति में समता बनी रहे, प्रतिकार के स्थान पर क्षमा, क्रोध के स्थान पर शांति और प्रतिक्रिया के स्थान पर विवेकपूर्ण आचरण हो।
समाज के लोगों ने लिया धर्मलाभ
मोक्ष कल्याणक के पावन अवसर पर समाज के युवा वर्ग से लेकर बुजुर्गों तक ने भगवान चिंतामणि पारसनाथ का अभिषेक एवं शांतिधारा पूरे भक्तिभाव के साथ की। धार्मिक आयोजन में समाज के सभी वर्गों के श्रद्धालु उपस्थित रहे और भगवान पारसनाथ के दर्शन, पूजन एवं धार्मिक कार्यक्रम में सहभागिता कर धर्मलाभ लिया।
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