महिलाओं को शासन–प्रशासन में 33% हिस्सेदारी न देना घोर अन्याय : अहरवाल
“5–10 हजार रुपए लो, पर निर्णय-निर्माण में मत आओ… यही राजनीति का वास्तविक चरित्र”
सिवनी, 16 नवंबर 2025
सिवनी यशो – सामाजिक कार्यकर्ता रघुवीर अहरवाल ने कहा है कि देश के सभी राजनीतिक दल महिलाओं को शासन–प्रशासन में 33 प्रतिशत हिस्सेदारी देने का दावा तो करते हैं, लेकिन वास्तविक रूप से उन्हें निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया से दूर रखा जा रहा है। “माता-बहिन कहकर पैर छूने की राजनीति और 1500, 5 हजार या 10 हजार रुपए देकर खुश करने का प्रयास, वास्तव में महिलाओं को उनका हक़ न देने का खूबसूरत धोखा है,” अहरवाल ने कहा।
बिहार का उदाहरण: 33% के हिसाब से 70 सीटें सुरक्षित होना थीं, लेकिन नहीं हुईं
अहरवाल ने ताजा उदाहरण देते हुए बताया कि बिहार विधानसभा में 33% आरक्षण लागू होता, तो करीब 70 सीटें महिलाओं के लिए सुरक्षित होतीं, जिससे लगभग 80 महिलाएं विधानसभा तक पहुंच सकती थीं।
“लेकिन ऐसा नहीं किया गया। यही स्थिति देश की संसद प्रांतों की विधानसभाओं और न्यायालयों तक में है। जहां 33% महिलाएं होना चाहिए थीं, वहां नाम मात्र की हिस्सेदारी दिखती है।
सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट और प्रशासन में भी हिस्सेदारी का अभाव
अहरवाल ने कहा कि महिला आरक्षण सिर्फ चुनावों तक सीमित नहीं होना चाहिए।
“सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट, IAS–IPS से लेकर सभी सरकारी विभागों में 33% महिला अधिकारी और कर्मचारी होना चाहिए था,
लेकिन आज भी यह व्यवस्था लागू नहीं की गई है। इससे साफ है कि-
राजनीतिक दल महिलाओं को उनका अधिकार नहीं देना चाहते।”
“5 या 10 हजार रुपए नहीं, वास्तविक हिस्सेदारी ही बदलेगी महिलाओं की जिंदगी”
उन्होंने कहा कि करोड़ों महिलाओं को 1500, 5000 या 10,000 रुपए देने से उनका वास्तविक विकास संभव नहीं है।
“यदि महिलाओं को 33 प्रतिशत हिस्सेदारी दी जाए,
तो लाखों महिलाएं शासन–प्रशासन में शामिल होंगी और वहां से वे महिलाओं के हित में ठोस योजनाएं बना सकेंगी।
रोजगार, सम्मान और सुरक्षा—हक़ मिलने पर बदलेगी तस्वीर
अहरवाल ने कहा कि महिलाओं को उचित हिस्सेदारी मिलने पर उन्हें सम्मानजनक रोजगार,
15 हजार से लेकर लाखों रुपए मासिक आय, समाज में सम्मान, और सुरक्षा—सब कुछ मिलेगा।
“निर्णय-निर्माण में भागीदारी ही महिलाओं का वास्तविक समग्र विकास है,”



