कोर्ट के आदेश की आड़ में प्रभावशाली रवैया?
आरईएस के कार्यपालन यंत्री उपेन्द्र मिश्रा की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल
Seoni 17 February 2026
सिवनी RES corruption का मामला अब गंभीर मोड़ पर पहुंच चुका है। ग्रामीण इंजीनियरिंग सेवा (RES) में पदस्थ उपेंद्र मिश्रा पर आरोप है कि वे कोर्ट आदेश की आड़ में प्रभावशाली संरक्षण का लाभ लेते हुए जांच और कार्रवाई से बचने का प्रयास कर रहे हैं। इस पूरे प्रकरण ने प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सिवनी यशो:- ग्रामीण यांत्रिकी सेवा (आरईएस) के कार्यपालन यंत्री उपेन्द्र मिश्रा को लेकर इन दिनों विभागीय और प्रशासनिक हलकों में चर्चाओं का दौर तेज है। हाईकोर्ट से स्थानांतरण आदेश निरस्त होने के बाद उनके कथित रवैये और कार्यशैली पर कई सवाल खड़े किए जा रहे हैं। शिकायतकर्ताओं और विभागीय सूत्रों का कहना है कि उक्त आदेश के बाद मिश्रा स्वयं को “किसी राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव से मुक्त” बताते हुए विभागीय निर्णयों में एकतरफा रवैया अपना रहे हैं।
विभागीय कार्यप्रणाली को लेकर बढ़ती असंतुष्टि
शिकायतकर्ताओं के अनुसार, मिश्रा के कार्यकाल में आरईएस विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर असंतोष बढ़ा है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि कई निर्माण कार्यों में पारदर्शिता का अभाव है और प्रक्रियागत नियमों का पालन अपेक्षित स्तर पर नहीं हो पा रहा।
विभागीय सूत्र बताते हैं कि कुछ मामलों में जनप्रतिनिधियों और संबंधित अधिकारियों की अनुशंसाओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया, जिससे आंतरिक असहमति की स्थिति बनी।
समितियों पर सवाल
सूत्रों के अनुसार, मिश्रा के कार्यकाल में बड़े पैमाने पर हुए निर्माण कार्यों को लेकर शिकायतें शासन स्तर तक पहुंचीं। इन शिकायतों के आधार पर विभिन्न समयों पर जांच समितियों का गठन भी किया गया।
हालांकि, शिकायतकर्ताओं का कहना है कि इन जांचों के निष्कर्ष सार्वजनिक नहीं हो सके और न ही यह स्पष्ट हो पाया कि जांच में क्या पाया गया। इससे यह धारणा बन रही है कि जांच की प्रक्रिया अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ पाई।
जनप्रतिनिधियों की नाराज़गी
बताया जा रहा है कि आरईएस विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर कुछ जनप्रतिनिधियों ने भी असंतोष जताया है। जिला पंचायत और जनपद पंचायत स्तर के जनप्रतिनिधियों द्वारा शासन और विभागीय उच्चाधिकारियों को पत्र लिखे जाने की जानकारी सामने आई है।
जनप्रतिनिधियों का कहना है कि ग्रामीण विकास से जुड़े कार्यों में उनकी अनुशंसाओं की अनदेखी होने से योजनाओं के क्रियान्वयन पर नकारात्मक असर पड़ रहा है।
प्रशासनिक स्पष्टता की मांग
इतनी शिकायतों और पत्राचार के बाद भी अब तक किसी ठोस कार्रवाई या आधिकारिक स्पष्टीकरण का अभाव प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर रहा है।
यदि आरोप निराधार हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच कर स्थिति स्पष्ट किए जाने की आवश्यकता है, और यदि कहीं प्रक्रियागत या प्रशासनिक चूक हुई है तो उसके लिए जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए—ऐसी मांग अब सार्वजनिक रूप से उठने लगी है।
जवाबदेही तय होगी या नहीं?
पूरा मामला अब एक अहम सवाल पर आकर ठहर गया है—
क्या कोर्ट के आदेश की आड़ में उठे इन सवालों की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच होगी, या फिर जांच समितियां केवल औपचारिकता बनकर रह जाएंगी?
ग्रामीण क्षेत्रों में विकास कार्यों से जुड़ा यह विषय सीधे जनता के हित से जुड़ा है, इसलिए शासन और विभाग से स्पष्ट, पारदर्शी और समयबद्ध कार्रवाई की अपेक्षा की जा रही है।
इस पूरे प्रकरण में Upendra Mishra की भूमिका को लेकर उठे सवालों ने अब जिले की प्रशासनिक व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है। आने वाले दिनों में शासन की प्रतिक्रिया इस मामले की दिशा तय करेगी।



