हाईकोर्ट के निर्देश भी बेअसर? 2013 के बाद से चुनावों पर विराम, किसानों की संस्थाओं में लोकतंत्र बहाल करने से क्यों बच रही सरकार : फिरोज खान
Seoni, 27 October 2026
सिवनी यशो:- मध्यप्रदेश में किसानों के नाम पर राजनीति करने वाली भाजपा सरकार से कांग्रेस नेता फिरोज खान ने सीधा सवाल किया है—जब प्रदेश में चुनाव होते हैं, सरकारें बनती हैं और जनप्रतिनिधियों को जनता के सामने जवाब देना पड़ता है, तो फिर किसानों की सहकारी संस्थाओं में लोकतंत्र बहाल करने से सरकार क्यों कतरा रही है? वर्ष 2013 के बाद प्राथमिक कृषि साख सहकारी समितियों के नियमित चुनाव नहीं होना और वर्षों से प्रशासकीय व्यवस्था का बने रहना सरकार की नीयत, जवाबदेही और सहकारिता के मूल सिद्धांतों पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
फिरोज खान ने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार किसानों की उन
संस्थाओं में निर्वाचित नेतृत्व बहाल करने के बजाय प्रशासकीय व्यवस्था को जारी रखे हुए है, जिनसे प्रदेश के लगभग 50 लाख किसान जुड़े हैं। उन्होंने कहा कि किसानों की संस्थाएं किसी सरकार की जागीर नहीं हैं, जहां किसानों के अधिकारों को दरकिनार कर प्रशासकों के भरोसे व्यवस्था चलाई जाती रहे। सहकारिता का मूल आधार किसानों की भागीदारी और उनके चुने हुए प्रतिनिधियों का नेतृत्व है। यदि यही अधिकार वर्षों तक रोक दिया जाए, तो सहकारिता के लोकतांत्रिक स्वरूप का क्या अर्थ रह जाता है?
2018 में कार्यकाल खत्म, 2026 तक भी चुनाव नहीं!
प्रदेश की 4,534 प्राथमिक कृषि साख सहकारी समितियों के चुनाव वर्ष 2013 में हुए थे। इनके संचालक मंडलों का कार्यकाल वर्ष 2018 तक था। इसके बाद चुनाव नहीं हुए और सहकारी संस्थाओं में प्रशासकीय व्यवस्था चलती रही। जिला सहकारी केंद्रीय बैंकों और अपेक्स बैंक की निर्वाचित व्यवस्था पर भी इसका असर पड़ा।
जुलाई 2024 में चुनाव प्रक्रिया शुरू होने की खबरें सामने आईं। राज्य सहकारी निर्वाचन प्राधिकारी ने चुनाव कार्यक्रम जारी किया, लेकिन सदस्यता सूची तैयार नहीं होने तथा खरीफ की बोवनी में किसानों की व्यस्तता जैसे कारणों का हवाला देकर चुनाव स्थगित कर दिए गए।
फिरोज खान ने सवाल उठाया कि जब चुनाव कराने के लिए कार्यक्रम घोषित हो सकता है, तो सदस्यता सूचियों की कमियां दूर करके चुनाव संपन्न क्यों नहीं कराए जा सकते? क्या दो वर्षों में इतनी भी प्रशासनिक क्षमता नहीं दिखाई जा सकी कि पात्र समितियों की निर्वाचन प्रक्रिया पूरी हो जाए? आखिर हर बार चुनाव टालने का खामियाजा किसान ही क्यों भुगतें?
हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद भी चुनाव का इंतजार क्यों?
कांग्रेस नेता ने कहा कि सहकारी समितियों के चुनाव का मामला मध्यप्रदेश हाईकोर्ट तक पहुंचा और न्यायालय ने चुनाव कराने के निर्देश दिए। इसके बाद निर्वाचन कार्यक्रम भी घोषित हुआ, लेकिन चुनाव फिर टल गए। अक्टूबर 2026 तक चुनाव नहीं होने की स्थिति में सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि निर्वाचन प्रक्रिया कहां अटकी हुई है और न्यायालय के निर्देशों के पालन के लिए अब तक क्या ठोस कदम उठाए गए हैं।
उन्होंने कहा कि न्यायालय के आदेशों का पालन करना सरकार की जिम्मेदारी है। यदि कोई कानूनी बाधा है, तो उसे दूर करने के लिए समयबद्ध कार्रवाई होनी चाहिए। यदि प्रशासनिक अड़चन है, तो उसका समाधान किया जाना चाहिए। लेकिन किसानों को वर्षों तक उनके अधिकारों से वंचित रखकर चुप्पी साध लेना किसी भी तरह उचित नहीं ठहराया जा सकता।
फिरोज खान ने मांग की कि सरकार चुनावों की वर्तमान स्थिति, लंबित प्रक्रियाओं और निर्वाचन की समय-सीमा को सार्वजनिक करे, ताकि किसानों को पता चल सके कि उनकी संस्थाओं में लोकतंत्र कब लौटेगा।
प्रशासक स्थायी व्यवस्था नहीं, फिर किसानों की संस्थाओं पर कब तक कब्जा?
फिरोज खान ने कहा कि प्रशासक नियुक्त करना विशेष परिस्थितियों में अस्थायी व्यवस्था हो सकती है, लेकिन इसे निर्वाचित संचालक मंडलों का स्थायी विकल्प नहीं बनाया जा सकता। सहकारी संस्थाओं का संचालन किसानों के हितों, नियमों और पारदर्शिता के आधार पर होना चाहिए। वर्षों तक चुनाव न कराना और सरकारी अधिकारियों के माध्यम से संस्थाओं का संचालन जारी रखना सहकारिता की भावना के विपरीत है।
उन्होंने आरोप लगाया कि लंबे समय से चली आ रही इस व्यवस्था ने किसानों के प्रतिनिधित्व और संस्थाओं की जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल पैदा कर दिए हैं। किसानों को यह जानने का अधिकार है कि उनकी संस्थाओं में वित्तीय फैसले कौन ले रहा है, ऋण वितरण और अन्य सेवाओं की निगरानी कैसे हो रही है तथा संस्थाओं के संसाधनों के उपयोग के लिए जिम्मेदार कौन है।
उन्होंने कहा कि यदि कहीं वित्तीय अनियमितता, मनमानी या अधिकारों के दुरुपयोग की शिकायत है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। संस्थाओं के खातों, निर्णयों और प्रशासनिक कामकाज की पारदर्शी समीक्षा की जाए।
किसानों की मेहनत और पूंजी से खड़ी संस्थाओं में जवाबदेही सुनिश्चित करना सरकार का दायित्व है, न कि चुनावों को अनिश्चितकाल तक टालना।
कभी सदस्यता सूची, कभी दूसरा बहाना—आखिर कब तक चलेगा यह खेल?
कांग्रेस नेता ने कहा कि सदस्यता सूची में गड़बड़ी या किसी समिति की पात्रता संबंधी समस्या को चुनाव टालने का स्थायी बहाना नहीं बनाया जा सकता। जिन समितियों में पात्रता संबंधी विवाद हैं, उनका नियमों के अनुसार निराकरण किया जाए। जो समितियां चुनाव के लिए पात्र हैं, उनकी निर्वाचन प्रक्रिया तत्काल पूरी की जाए।
उन्होंने कहा कि सरकार को प्रत्येक समिति की स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। सदस्यता सूची कब तैयार होगी, आपत्तियों का निराकरण कब होगा, पात्रता विवादों का समाधान कब होगा और मतदान की तारीख कब घोषित की जाएगी—इन सभी सवालों का जवाब मिलना चाहिए।
फिरोज खान ने कहा कि किसानों को ऋण, खाद-बीज, उपार्जन और सहकारी सेवाओं के लिए जवाबदेह व्यवस्था चाहिए। उनकी संस्थाओं में निर्णय लेने वाले प्रतिनिधि किसानों के प्रति उत्तरदायी होने चाहिए। लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर करके किसानों के हितों की रक्षा करने का दावा नहीं किया जा सकता।
भाजपा सरकार जवाब दे—चुनाव कराएगी या प्रशासकों के भरोसे ही चलेंगी संस्थाएं?
फिरोज खान ने भाजपा सरकार के सामने स्पष्ट मांगें रखीं—
प्रदेश की पात्र प्राथमिक कृषि साख सहकारी समितियों के चुनाव कराने का समयबद्ध कार्यक्रम घोषित किया जाए।
जिला सहकारी केंद्रीय बैंकों और संबंधित सहकारी संस्थाओं के चुनावों की वर्तमान स्थिति स्पष्ट की जाए।
सदस्यता सूचियों, पात्रता विवादों और लंबित निर्वाचन प्रक्रियाओं का समय-सीमा में निराकरण किया जाए।
हाईकोर्ट के निर्देशों के पालन की स्थिति सार्वजनिक की जाए।
प्रशासकीय व्यवस्था के दौरान संस्थाओं के वित्तीय और प्रशासनिक कामकाज की पारदर्शी समीक्षा सुनिश्चित की जाए।
उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार को अब स्पष्ट करना होगा कि वह किसानों को उनकी संस्थाओं में लोकतांत्रिक अधिकार लौटाना चाहती है या प्रशासकीय व्यवस्था को ही जारी रखना चाहती है।
फिरोज खान ने कहा कि किसानों की सहकारी संस्थाओं में चुनाव कराना सरकार का उपकार नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही का सवाल है। प्रदेश के किसान वर्षों से अपने प्रतिनिधियों का इंतजार कर रहे हैं। अब बहाने नहीं, जवाब चाहिए; केवल घोषणाएं नहीं, चुनाव चाहिए। किसानों की संस्थाओं में लोकतंत्र बहाल करना ही सहकारिता के सम्मान और किसानों के अधिकारों की वास्तविक रक्षा होगी।