धर्ममध्यप्रदेशसिवनी

शूलपानी की कठिन यात्रा: जब माँ नर्मदा ने स्वयं थामे हाथ – भाग 9

कपिल पांडे की नर्मदा परिक्रमा यात्रा — भाग 9

स्थान: कुली गांव से लखनगिरि बाबा आश्रम तक 
सुबह की पहली हवा, सूरज की पहली किरण और माँ नर्मदा की गोद में एक और दिन की शुरुआत… कुली गांव में।


लेकिन यह सुबह साधारण नहीं थी — यह मन के द्वंद्व और आत्मा की आस्था के बीच संघर्ष की सुबह थी।

परिक्रमा अब कठिन दौर में थी। रास्ता साइकिल के लायक नहीं रह गया था। मन लौट चलने को कहता था, लेकिन आत्मा जानती थी — अधूरी परिक्रमा, अधूरा समर्पण है।

यह भी पढ़े :-शूलपानी की झड़ी की ओर पहली चुनौतीपूर्ण चढ़ाई – नर्मदा परिक्रमा

सर्द हवाओं और जलते अलाव के बीच कुछ परिक्रमावासियों से चर्चा हुई — दो नेपाली युवक, आस्था से भरे हुए। उन्होंने कहा —
“बाबा, हम हैं न… साथ चलो।”
बस, वही एक वाक्य हिम्मत दे गया — अब लौटना नहीं था।

लखनगिरि की ओर…

लखनगिरि बाबा का आश्रम मात्र 5 किमी दूर था,
पर हर मीटर किसी युग के बराबर लगने लगा। नेपाली भाई आगे निकल गए, और हम अकेले पड़ गए।

यह भी पढ़े :-सिवनी में निकलेगी जगन्नाथ स्वामी की रथ यात्रा, पूर्व संध्या पर भजन संध्या का आयोजन

माँ नर्मदा का नाम लेते हुए एक-एक कदम खींचते चल रहे थे…
तभी दूर से कुछ बालक आते दिखे।
“बाबा, लाओ हम आपकी साइकिल पकड़ लेते हैं…”
उनकी मासूम आवाज़ माँ के भेजे देवदूत सी लगी। वे पांच बालक जैसे ईश्वर की करुणा का साक्षात रूप थे।

शूलपानी की दुर्गम चढ़ाई
“बाबा, लाओ हम आपकी साइकिल पकड़ लेते हैं

ढलानों पर साइकिल रस्सियों से उतारी गई। जब हमने कुछ देने की कोशिश की, वे मुस्कराए, सिर हिलाया और चले गए…
मन भर आया।

माँ की गोद में यात्रा…

अब आगे की राह जल मार्ग से तय होनी थी।
20 रुपये का टिकट और माँ की कृपा।
दोपहर 2 बजे — हम लखनगिरि बाबा आश्रम पहुँच गए।

बाबा अब इस लोक में नहीं हैं, लेकिन जलमग्न समाधि माँ की गोद में समाई प्रतीत होती है। वहीं भोजन मिला, विश्राम मिला।

भोजन के बाद दो स्थानीय युवक हमारी साइकिल को देखकर मुस्कराए —
“बाबा, नाव आ रही है… हम आपको आगे पहाड़ी पार करा देंगे।”

और फिर… नाव आ गई।

यह भी पढ़े :-<सांसद बंटी विवेक साहू ने खंडवा दादा दरबार के लिए शुरू की 411 किमी की पदयात्रा/p>

माँ ने पार कराया…

5 घंटे नाव में बिताए।
जिन पहाड़ियों को पार करने में लोगों को 7 दिन लगते हैं, वे आज 5 घंटे में पार हो गईं। 

आँखों से आँसू थम नहीं रहे थे…
माँ नर्मदा स्वयं अपनी गोदी में लेकर अपने बच्चे को पार करा रही थीं।

अब हम भील गांव में हैं।

शूलपानी पार हो चुका है… लेकिन यह यात्रा नहीं, एक आध्यात्मिक पुनर्जन्म है।

नर्मदा परिक्रमा — एक आस्था का यज्ञ

“यह परिक्रमा शरीर से नहीं,
विश्वास से होती है।
और माँ जब साथ चलती हैं…
तो हर शूल भी फूल बन जाता है।”

🔸 नर्मदे हर! यात्रा जारी है… 

पढ़ते रहिए – https://dainikyashonnati.com

Dainikyashonnati

Related Articles

Back to top button
error: Content is protected !!