“धर्म से कमाई नहीं, कमाई से धर्म करो; यही पुण्य का मार्ग: शंकराचार्य सदानंद सरस्वती”
मेरा-तुम्हारा’ का भेद ही सांसारिक बंधन का कारण, कामना पाप का मूल कारण; गौ सेवा हिंदुत्व की पहचान
धर्म कमाई का जरिया नहीं, धन से धर्म करना ही सच्चा पुण्य: शंकराचार्य
सिवनी यशो :- द्वारका शारदा पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री सदानंद सरस्वती जी महाराज ने धर्म और धन के संबंध को लेकर समाज को महत्वपूर्ण संदेश देते हुए कहा कि धर्म को धन अर्जित करने का माध्यम नहीं बनाना चाहिए, बल्कि धन का उपयोग धर्म कार्यों में कर पुण्य अर्जित करना चाहिए। उन्होंने कहा कि गरीबी दूर करने के लिए धर्म को साधन बनाना उचित नहीं है। धर्म का उद्देश्य आत्मिक उन्नति, सदाचार और लोककल्याण है।

जगद्गुरु शंकराचार्य जी महाराज मंगलवार को सिवनी के सीलादेही स्थित द्वारकाधीश मंदिर आश्रम में आयोजित सत्संग में श्रद्धालुओं को संबोधित कर रहे थे। उनके सिवनी आगमन के बाद बड़ी संख्या में श्रद्धालु प्रतिदिन उनके दर्शन एवं सत्संग का लाभ लेने पहुंच रहे हैं।
उन्होंने कहा कि परमात्मा ने अपने कौतुक के लिए संसार की रचना की है। मनुष्य के सुख-दुख उसके पूर्व जन्म के प्रारब्ध से जुड़े हैं। ‘मेरा-तुम्हारा’ का भेदभाव ही सांसारिक बंधन का प्रमुख कारण है, जबकि कामना पाप का मुख्य कारण है। मनुष्य को मोह-माया और अनावश्यक इच्छाओं से ऊपर उठकर सत्कर्म के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए।
गौ सेवा हिंदुत्व की पहचान
शंकराचार्य जी ने कहा कि गौ सेवा हिंदुत्व की पहचान है। गाय को राष्ट्र माता की श्रेणी में रखने से समाज में गौ माता के प्रति श्रद्धा और सेवा की भावना जागृत होगी। उन्होंने सनातन परंपरा में गौ सेवा के महत्व को रेखांकित करते हुए समाज से गौ संरक्षण एवं सेवा के लिए आगे आने का आह्वान किया।
84 लाख योनियों में मनुष्य जीवन श्रेष्ठ
उन्होंने कहा कि 84 लाख योनियों में मनुष्य योनि श्रेष्ठ मानी गई है। मनुष्य ही पूर्व जन्म के कर्मों का फल भोगने के साथ वर्तमान जीवन में पुण्य कर्मों का संचय कर सकता है। सत्संग भी पूर्व जन्मों के पुण्य का फल है, इसलिए मनुष्य को अपने जीवन को सार्थक बनाने के लिए सत्संग, सदाचार और सेवा को अपनाना चाहिए।
पाप का फल देर से मिले, लेकिन भोगना ही पड़ता है
शंकराचार्य जी ने कहा कि पूर्व जन्मों के पुण्य के कारण कई बार पाप कर्म का फल तत्काल दिखाई नहीं देता, लेकिन पाप का फल कालांतर में भोगना ही पड़ता है। मनुष्य को अपने बौद्धिक ज्ञान से विज्ञान को समझना चाहिए और जीवन में अनावश्यक वस्तुओं एवं मोह का त्याग करना चाहिए। जो वस्तुएं जीवन के लिए आवश्यक नहीं हैं, उनके त्याग से कोई वास्तविक हानि नहीं होती।
7 अक्टूबर को वृंदावन धाम के लिए प्रस्थान
ज्ञातव्य है कि चातुर्मास अनुष्ठान के पश्चात जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री सदानंद सरस्वती जी महाराज अपने पूज्य गुरुवर ब्रह्मलीन जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज की जन्मस्थली शिव की नगरी सिवनी पहुंचे हैं। सिवनी के नवोदित तीर्थ क्षेत्र में प्रतिष्ठित द्वारकाधीश मंदिर आश्रम में उनके दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं।
पूज्य शंकराचार्य जी महाराज 7 अक्टूबर को दोपहर 12 बजे सिवनी से नागपुर होते हुए वृंदावन धाम के लिए प्रस्थान करेंगे, जहां वे नवरात्र अनुष्ठान एवं व्रत करेंगे।
सत्संग के पावन अवसर पर सैकड़ों श्रद्धालु नर-नारियों की उपस्थिति रही। श्रद्धालुओं ने ‘धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सद्भावना हो और विश्व का कल्याण हो’ के उद्घोष के साथ सत्संग का लाभ लिया।
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