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ब्रजेश राजपूत की जमानत सुनवाई के बाद निरस्त

गंभीर आरोपों और पूर्व मामलों के आधार पर न्यायालय ने जमानत निरस्त करने का आदेश दिया

Seoni 31 October 2025 सिवनी यशो:- तृतीय अपर सत्र न्यायाधीश श्री बलवीर सिंह की अदालत ने शुक्रवार को प्रस्तुत जमानत आवेदन क्रमांक 523/2025 में आवेदक ब्रजेश राजपूत पिता स्व. नागेंद्र सिंह राजपूत, निवासी ग्राम मारबोड़ी, थाना बंडोल, जिला सिवनी (म.प्र.) की नियमित जमानत अर्जी पर सुनवाई करते हुए जमानत निरस्त कर दी।

 मामला और धाराएँ

मामला थाना कोतवाली सिवनी के अपराध क्रमांक 899/2025 से संबंधित है, जो धारा 121(1), 132, 221, 296, 324(4), 351(3), 191(2) भारतीय न्याय संहिता (भा.न्या.सं.) के तहत पंजीबद्ध है।

 एफआईआर एवं सह-अभियुक्तों के नाम

थाना कोतवाली सिवनी द्वारा प्राप्त लिखित रिपोर्ट के आधार पर  ब्रजेश राजपूत सहित निम्नलिखित सह-अभियुक्तों के विरुद्ध मामला दर्ज किया गया—

  • योगेश राजपूत
  • नरेन्द्र ठाकुर
  • अखिलेश खेड़ीकर
  • ओमप्रकाश (उर्फ मुन्ना) महाराज
  • कुलदीप ठाकुर
  • अजय ठाकरे
  • ब्रजेश राजपूत (आवेदक)

अभियोजन पक्ष की ओर से ए.डी.पी.ओ. ने न्यायालय से निवेदन किया कि अपराध की गंभीरता को देखते हुए अभियुक्त को जमानत का लाभ न दिया जाए।

पृष्ठभूमि और आरोप

अदालत में प्रस्तुत रिपोर्ट के अनुसार, दिनांक 19 अक्टूबर 2025 को थाना नवेगांव, जिला बालाघाट में पदस्थ उपनिरीक्षक अमित अग्रवाल ने थाना कोतवाली सिवनी में रिपोर्ट दर्ज कराई थी।

उन्होंने बताया कि वे भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराओं 13(1)(ए), 13(2) के तहत गठित एसआईटी टीम के सदस्य हैं और थाना बालाघाट के अपराध क्रमांक 628/25 की विवेचना में सहयोग हेतु योगेश राजपूत के घर पहुंचे थे।

रिपोर्ट के मुताबिक पूछताछ के दौरान योगेश राजपूत (जो पुलिस प्रधान आरक्षक हैं) ने आसपास के लोगों को बुला लिया।

मौके पर भारी भीड़ एकत्र हुई,

जिसमें ब्रजेश राजपूत और नरेन्द्र ठाकुर सहित

अन्य लोगों ने शासकीय कार्य में बाधा उत्पन्न की।

घटना के दौरान शासकीय सेवक के साथ मारपीट, धमकी और मोबाइल तोड़ने जैसी घटनाएं हुईं।

अभियुक्त पक्ष के तर्क

अभियुक्त की ओर से अधिवक्ता वीरेन्द्र सोनकेशरिया उपस्थित हुए और कहा कि —

  • आवेदक को विभागीय प्रतिशोधवश झूठा फंसाया गया है।
  • वास्तविक अभियुक्त उनके भाई योगेश राजपूत हैं, जिन्होंने 2024 में विभागीय दंड के खिलाफ उच्च न्यायालय में रिट दायर की थी।
  • एफआईआर की वीडियोग्राफी में आवेदक द्वारा किसी भी प्रकार की हिंसक हरकत नहीं दिखती।
  • सभी धाराओं में सजा सात वर्ष से कम है और मामला न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी द्वारा विचारणीय है।

न्यायालय का अवलोकन और निर्णय

 केस डायरी एवं प्रतिवेदन का अवलोकन करने के बाद न्यायालय ने पाया कि –

अभियुक्त के विरुद्ध पूर्व में भी राज्य सुरक्षा अधिनियम एवं प्रतिबंधात्मक कार्यवाही से जुड़े प्रकरण दर्ज हैं।

न्यायालय ने माना कि अपराध गंभीर प्रकृति का है और

जमानत मिलने पर अभियुक्त के फरार होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।

अतः अर्नेश कुमार बनाम स्टेट ऑफ बिहार का लाभ इस स्थिति में लागू नहीं होता।

इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने आवेदक की जमानत अर्जी निरस्त कर दी। आदेशानुसार केस डायरी को मूल न्यायालय में वापस भेजने और अभिलेखागार में जमा करने के निर्देश दिए गए।

न्यायालय: बलवीर सिंह, तृतीय अपर सत्र न्यायाधीश, सिवनी
आदेश दिनांक: 31 अक्टूबर 2025
बीए नं.: 6180/2025 | CNR नं.: MP2201007759/2025
यह प्रकरण प्रशासनिक तंत्र, पुलिस विभाग और
न्यायिक प्रक्रिया के बीच संवेदनशील संतुलन का उदाहरण प्रस्तुत करता है।
अदालत ने यह स्पष्ट किया कि गंभीर अपराधों में विवेचना के दौरान राहत प्रदान नहीं की जा सकती।   

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