Seoni 01 August 2025
“परोपकार के समान कोई धर्म नहीं होता और दूसरों को पीड़ा पहुँचाने से बड़ा कोई अधर्म नहीं होता। सेवा से शत्रु भी मित्र हो जाता है। सेवा के लिए पैसे की जरूरत नहीं, बल्कि संकुचित जीवन छोड़ने की जरूरत है।”
मुनि श्री भावसागर जी महाराज ने आगे कहा कि जरूरतमंदों की निःस्वार्थ सेवा ही जीवन का वास्तविक आनंद है। धन-दौलत तभी सार्थक है, जब उसका उपयोग समाज और जनहित में हो। असली संपन्नता धन से नहीं, बल्कि जनसेवा से प्राप्त यश से आती है।
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- सेवा से हृदय शुद्ध होता है और अहंकार दूर होता है।
- माता-पिता की सेवा करना हर पुत्र का पहला कर्तव्य है।
- सबसे बड़ी सेवा है, अपनी खुशियाँ दूसरों के साथ बाँटना।
- परोपकार की भावना सभी गुणों में श्रेष्ठ है और अमरत्व दिलाती है।
अंत में मुनि श्री ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि जीवन में हर क्षण निःस्वार्थ परोपकार की भावना बनी रहनी चाहिए, क्योंकि यही जीवन को संतोष, पूर्णता और रस से भर देती है।



