प्रथम जैन तीर्थंकर भगवान श्री ऋषभदेव का निर्वाणोत्सव श्रद्धा एवं भक्ति से मनाया गया
भगवान ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र भरत के नाम से ही भारतवर्ष हुआ विख्यात
Seoni 17 January 2026
सिवनी यशो:- प्रथम जैन तीर्थंकर, आदि ब्रह्मा, आदिनाथ, वृषभदेव के नाम से विख्यात भगवान श्री ऋषभदेव का निर्वाणोत्सव माघ कृष्ण चतुर्दशी, शनिवार को सकल जैन समाज द्वारा श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया गया। इस अवसर पर जैन मंदिरों में विशेष धार्मिक अनुष्ठान, अभिषेक, शांति धारा एवं निर्वाण पूजन संपन्न हुआ।
भगवान श्री ऋषभदेव अयोध्या के अधिपति महाराजा नाभिराय एवं माता मरुदेवी के नंदन थे। वे अंतिम कुलकर माने जाते हैं। उन्होंने जनसामान्य को असि (शस्त्र), मसी (लेखन), कृषि, वाणिज्य, विद्या एवं शिल्प—इन छह उत्कृष्ट पुरुषार्थों द्वारा जीविका उपार्जन का मार्ग दिखाया।
उन्होंने “ऋषि बनो या कृषि करो” जैसे पवित्र सूत्र का उद्घोष कर समाज को श्रम, संयम और सदाचार की प्रेरणा दी।
भारतवर्ष का नाम भरत से जुड़ा
भगवान ऋषभदेव की नंदा एवं सुनंदा नामक दो रानियों से भरत, बाहुबली सहित 100 पराक्रमी पुत्र तथा ब्राह्मी और सुंदरी नाम की दो पुत्रियाँ हुईं। भगवान ऋषभदेव ने स्वयं अपनी पुत्रियों को अक्षर ज्ञान एवं अंक गणित की शिक्षा दी।
आज भी ब्राह्मी के नाम से ब्राह्मी लिपि का प्रादुर्भाव माना जाता है, जबकि चक्रवर्ती भरत के नाम से भारत देश को ‘भारत’ नाम प्राप्त हुआ, जो उनके ऐतिहासिक महत्व को दर्शाता है।
संसार से वैराग्य और संन्यास
स्वर्ग की अप्सरा नीलांजना के नृत्य को वैराग्य का निमित्त बनाकर भगवान ऋषभदेव ने राजमहल, वैभव और राजपाट का त्याग कर योग मार्ग को अपनाया और संसार से संन्यास का वरण किया।
अष्टापद कैलाश से मोक्ष प्राप्ति
कालांतर में भगवान ऋषभदेव ने अष्टापद (कैलाश पर्वत) से मोक्ष प्राप्त कर सिद्धत्व को प्राप्त किया और त्रैलोक्य पूज्य प्रथम जैन तीर्थंकर के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
वेदों में भी उल्लेख
वैदिक संस्कृति एवं वेदों में भी भगवान ऋषभदेव के निर्विकार, बालकवत दिगंबर स्वरूप का विस्तृत वर्णन मिलता है, जो उनके सार्वकालिक एवं सार्वधार्मिक महत्व को दर्शाता है।
निर्वाणोत्सव पर विशेष पूजन
निर्वाणोत्सव के अवसर पर सकल जैन समाज द्वारा मंदिरों में श्रीजी का अभिषेक,
शांति धारा की गई।
शुद्ध शर्करा,
घी,
काजू,
बादाम एवं अन्य उत्कृष्ट पदार्थों से निर्मित निर्वाण लाडू भगवान को समर्पित किया गया।
कुंडलपुर से जुड़ा ऐतिहासिक संयोग
इस वर्ष निर्वाणोत्सव के साथ एक विशेष ऐतिहासिक संयोग भी जुड़ा रहा।
17 जनवरी 2006 को कुंडलपुर तीर्थ में पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के सानिध्य में बड़े बाबा भगवान ऋषभदेव की सहस्त्रों वर्ष प्राचीन अतिशय प्रतिमा को नवीन जिन मंदिर की वेदिका पर गगन विहार कर विराजित किया गया था।
संयोगवश उस ऐतिहासिक तिथि की ईस्वी तिथि 17 जनवरी इस वर्ष माघ कृष्ण चतुर्दशी के रूप में भगवान ऋषभदेव के निर्वाणोत्सव से जुड़ गई।
ये रहे उपस्थित
भगवान ऋषभदेव का निर्वाणोत्सव अवसर पर दिगंबर जैन समाज के जनरल सचिव पारस जैन,
मिलन कुमार बाजल,
निर्मल कुमार बादल,
आनंद जैन,
मनोज बाजल,
डॉ. अपूर्व जैन,
अभय कुमार जैन (एडवोकेट),
जयकुमार,
चंद्रकुमार बैसाखिया,
प्रफुल्ल,
बंटी,
सिंकु चौधरी,
चंदन जैन,
नितिन बाबू सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु भक्तजन उपस्थित रहे।



