माँ की गोद में साधना, सेवा और संकल्प का दिन
नर्मदा परिक्रमा यात्रा – भाग 17
कपिल पांडे की साइकिल यात्रा से अनुभव
तिल-तिल बढ़ते शिवलिंग से प्रारंभ हुआ दिन
आज की सुबह शुरू हुई कोरल गांव के भव्य आश्रम से, जहाँ के पुजारी ने बताया कि इस मंदिर में शिवलिंग तिल-तिल कर हर वर्ष स्वयं बढ़ता है। यह रहस्यपूर्ण तथ्य सुनकर मन श्रद्धा से भर गया। भोलेनाथ के दर्शन कर हम माँ नर्मदा के तट की ओर बढ़े। वहाँ एक सज्जन हुसैन भाई मिले, जिन्होंने मगरमच्छों की उपस्थिति को लेकर सचेत किया। हमने तट से ही माँ को प्रणाम किया और अगली मंज़िल की ओर बढ़ चले।
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नारेश्वर महादेव: जहाँ शिवलिंग स्वयं प्रकट हुआ
गुजरात के भरूच जिले के समीप नारेश्वर महादेव मंदिर, माँ नर्मदा के किनारे स्थित यह स्थल अद्भुत शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरा हुआ है। मुख्य द्वार से प्रवेश करते ही मन में एक अद्भुत तरंग उठी। दर्शन के दौरान कुछ श्रद्धालु मिले जो अपनी मनोकामना पूर्ण होने पर स्वयं के वजन के बराबर मिठाई चढ़ा रहे थे। इस परंपरा ने माँ के प्रति लोगों की निष्ठा को दर्शाया।
दरोली गाँव – एक चेतावनी और चिंता का संदेश
दरोली गाँव में एक आश्रम पर ठहरने का विचार बना, पर वहाँ कोई नहीं था। वहीं पास में नर्मदा की रेत का अवैध उत्खनन होते देखा — बड़ी-बड़ी मशीनें, प्रकृति के हृदय को छलनी करती हुईं। कछुए और मगर जैसे जीव जो रेत में अंडे देते हैं, उनका जीवन संकट में है। यह दृश्य मन को भारी कर गया। हमने मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना की — “उन्हें सद्बुद्धि दें जो माँ की धरोहर को नष्ट कर रहे हैं।”
फक्कड़ बाबा – माँ की माटी के महामानव
कुछ दूर चलने के बाद भेंट हुई एक फक्कड़ साधु से — चेहरा तेज से भरा, आँखों में गहराई, जटाएं और लकड़ी लिए हुए, मानो स्वयं शिव का प्रतिरूप हों। हम साइकिल साथ लेकर उनके साथ माँ नर्मदा के किनारे पैदल चलने लगे। कुछ दूरी पर एक महात्मा मिले जो लेट-लेटकर परिक्रमा कर रहे थे — हर बार माँ के चरण छूते और फिर आगे बढ़ते। उनके हर क़दम से झलक रही थी निष्कपट भक्ति — “मैं कुछ नहीं, सब माँ है।”
भूख, प्यास और फिर माँ का साक्षात रूप – वृद्धा माता
लगातार चलते चलते जब शरीर थक गया, गला सूखने लगा, और पानी तक पहुँचने का रास्ता नहीं दिखा — उसी समय एक वृद्धा माता की मधुर आवाज़ आई — “बेटा, पानी पी लो।”
उनके चेहरे की शांति और हाथों का स्पर्श आज भी माँ नर्मदा के अस्तित्व का साक्षात प्रमाण लगता है। उन्होंने न केवल पानी पिलाया बल्कि आगे का मार्ग भी बताया। यह एक आत्मिक क्षण था।
पवित्र संगम: अनुसूइया माता का तपस्थल
हम आगे बढ़े गुजरात के डांग जिले की ओर, जहाँ पामर और अरंडी नदियों का संगम है। वहीं स्थित है माँ सती अनुसूइया का मंदिर, जो ऋषि अत्रि की तपोभूमि है।
पुराणों के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने माता की पतिव्रता शक्ति की परीक्षा ली और वे तीनों बालक बन गए। यहाँ की मिट्टी में वह शक्ति आज भी महसूस होती है।
रात्रि विश्राम: भगवान कुबेर भंडारी के चरणों में 
हमारी यात्रा का अंतिम पड़ाव था भगवान कुबेर भंडारी मंदिर। मंदिर पहुँचते-पहुँचते अंधेरा हो चुका था। एक धर्मशाला में विश्राम का स्थान मिला।
पूजन कर जब मंदिर पहुँचे, तो वहाँ की शक्ति और इतिहास ने मन को छू लिया। यही वह स्थान है जहाँ कुबेर ने शिवलिंग की स्थापना कर तप किया था और अपना राजपाठ पुनः प्राप्त किया। दर्शन के उपरांत वहाँ के पुजारी ने हमें इस स्थल की गाथा सुनाई।
भंडारगृह में भोजन ग्रहण कर, माँ को प्रणाम कर विश्राम के लिए लौट आए।
अंतिम अनुभूति:
आज का दिन जैसे माँ नर्मदा की गोद में साधना, सेवा, संघर्ष और संतोष का समागम था।
कल फिर एक नई यात्रा, एक नई सीख और माँ का नया रूप देखने को मिलेगा।
नर्मदे हर!
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