सिवनी में पंचायत तबादलों का नया “पावर सेंटर” ?, सचिवों की भागदौड़ अब नेताओं के नहीं, ठेकेदार के दफ्तर तक
पंचायत तबादलों को लेकर जिले में गरमाई चर्चाएं, छपारा का एक ठेकेदार बना “तबादला उद्योग” का कथित केंद्र
सिवनी पंचायत सचिव तबादला – “ठेकेदारी मॉडल” ?, सचिवों की भागदौड़ अब ठेकेदार के दफ्तर तक
पंचायत व्यवस्था से लेकर आदिम जाति कल्याण विभाग तक सवालों के घेरे में, विकास योजनाओं पर मंडरा रहा “दलाल तंत्र” का खतरा
Seoni, 12 June 2026
सिवनी यशो:- सिवनी जिले में अजब-गजब तरीके से व्यवस्थाओं के संचालन का मानो नया कीर्तिमान स्थापित किया जा रहा है। जिले में शासन की योजनाओं के क्रियान्वयन से लेकर विभागीय कार्यप्रणाली तक ऐसी विचित्र व्यवस्थाएं देखने को मिल रही हैं, जिनकी चर्चा अब आम लोगों से लेकर प्रशासनिक गलियारों तक पहुंच चुकी है।
ग्राम पंचायतों के निर्माण कार्यों की कार्यपद्धति पूरे मध्यप्रदेश में अलग पहचान बना चुकी है। निर्माण कार्यों की गुणवत्ता, स्वीकृतियों और भुगतान प्रक्रिया को लेकर पहले ही सवाल उठते रहे हैं। वहीं आदिम जाति कल्याण विभाग भी शासन की राशि के बंदरबांट को लेकर लगातार चर्चाओं में बना हुआ है। किसानों को खाद कैसे मिलेगी, उपज कहां और कैसे बिकेगी, समर्थन मूल्य का लाभ किसे मिलेगा — इन सभी व्यवस्थाओं में दलाल तंत्र की गहरी पैठ होने के आरोप लंबे समय से लगते रहे हैं।
अब जिले में तबादलों का मौसम शुरू होते ही एक नई और बेहद चौंकाने वाली चर्चा ने जोर पकड़ लिया है। चर्चा यह है कि सिवनी जिले की पंचायतों के सचिवों और पंचायत कर्मियों के तबादलों की पूरी “व्यवस्था” एक चर्चित ठेकेदार के जिम्मे कर दी गई है।
यह भी पढ़े :- नगरपालिका सिवनी में भ्रष्टाचार का खुला खेल!
नेता-अफसर नहीं, अब ठेकेदार का दफ्तर बना “ट्रांसफर हब” !
जिले में इन दिनों सबसे अधिक चर्चा इस बात की है कि पंचायत सचिवों की भागदौड़ अब जिला पंचायत कार्यालय, जनपद पंचायतों, नेताओं या अधिकारियों के घरों तक सीमित नहीं रह गई है। अब पंचायत सचिव और पंचायत कर्मी छपारा की ओर जाते दिखाई दे रहे हैं।
चर्चाओं के अनुसार सिवनी जिले की आठों जनपद पंचायतों के सचिव और पंचायत कर्मी इन दिनों छपारा स्थित एक ठेकेदार के कार्यालय के चक्कर लगा रहे हैं। यह स्थिति प्रशासनिक व्यवस्था और लोकतांत्रिक प्रणाली दोनों पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।
यह भी पढ़े :- विकसित भारत संकल्प यात्रा का आमजनों को हो व्यापक लाभ – आलोक
यदि इन चर्चाओं में जरा भी सच्चाई है तो यह केवल तबादलों का मामला नहीं, बल्कि शासन की विकास योजनाओं को “प्राइवेट कंट्रोल सिस्टम” में बदलने की खतरनाक शुरुआत मानी जा सकती है।
क्या सत्ताधारी दल के नेता भी हो रहे बौने ?
जिले में चल रही चर्चाओं के अनुसार पंचायत तबादलों की इस कथित व्यवस्था के सामने अब सत्ताधारी दल के कई नेता भी बौने साबित होते दिखाई दे रहे हैं। पंचायत सचिवों और कर्मचारियों के तबादलों में कथित रूप से जिस तरह ठेकेदार की भूमिका सामने आ रही है, उसने राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों व्यवस्थाओं पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
यह भी पढ़े :-उगली क्षेत्र के शिक्षक व पंचायत सचिव सेवानिवृत्त, सम्मानपूर्ण विदाई समारोह में भावुक क्षण
लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर एक ठेकेदार को इतनी ताकत किसने दी? क्या पंचायत विभाग के अधिकारी इस व्यवस्था से अनजान हैं? क्या तबादलों का अधिकार अब प्रशासन के बजाय बाहरी लोगों के हाथों में पहुंच चुका है?
“विकास” के नाम पर नया खेल ?
जानकारों का कहना है कि पंचायत व्यवस्था ग्रामीण विकास की रीढ़ मानी जाती है। यदि पंचायत सचिवों और पंचायत कर्मियों की पदस्थापना एवं तबादले भी कथित रूप से बाहरी प्रभाव और ठेकेदारी सिस्टम से संचालित होने लगे तो शासन की योजनाओं का क्या होगा, इसका अंदाजा सहज लगाया जा सकता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क, नाली, भवन, जल योजना, पंचायत भवन, सीसी रोड और अन्य निर्माण कार्यों में पहले ही भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी के आरोप लगते रहे हैं। अब यदि तबादलों का नेटवर्क भी कथित रूप से “ठेकेदारी मॉडल” पर चलने लगे तो विकास योजनाएं केवल कागजों तक सीमित होने का खतरा बढ़ जाएगा।
प्रशासन की चुप्पी बढ़ा रही सवाल
हालांकि पंचायत विभाग के अधिकारी और अधिकार संपन्न जिम्मेदार व्यक्तियों की इस पूरे मामले में क्या भूमिका है, यह अभी स्पष्ट नहीं है। लेकिन जिले में जिस तरह चर्चाएं चल रही हैं, उसने आम लोगों के बीच अविश्वास का माहौल बना दिया है।
लोगों का कहना है कि यदि इन चर्चाओं में तथ्य नहीं हैं तो प्रशासन को सामने आकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। वहीं यदि मामला सही है तो इसकी निष्पक्ष जांच होना बेहद जरूरी है।
शासन की योजनाओं पर “दलाल तंत्र” का कब्जा ?
सिवनी जिले में लंबे समय से यह आरोप लगते रहे हैं कि शासन की कई योजनाएं अब सीधे आम जनता तक पहुंचने के बजाय “दलाल तंत्र” के माध्यम से संचालित हो रही हैं। खाद वितरण से लेकर समर्थन मूल्य पर खरीदी, निर्माण कार्यों से लेकर विभागीय भुगतान और अब तबादलों तक — हर जगह कथित बिचौलिया व्यवस्था सक्रिय बताई जा रही है।
ऐसे में सवाल यह भी उठ रहा है कि आखिर जिले में प्रशासनिक व्यवस्था चल कौन रहा है — अधिकारी, जनप्रतिनिधि या फिर ठेकेदारी नेटवर्क?
यदि समय रहते इस प्रकार की व्यवस्थाओं पर नियंत्रण नहीं हुआ तो यह केवल प्रशासनिक अव्यवस्था नहीं, बल्कि ग्रामीण विकास की पूरी संरचना को खोखला करने वाली स्थिति साबित हो सकती है।



