इंदिरा भवन में कांग्रेस की पत्रकारवार्ता, छह माह में 80 नवजातों की मौत पर उठाए सवाल; स्वास्थ्य व्यवस्था की जवाबदेही तय करने और निष्पक्ष जांच की मांगSeoni, 19 October 2026सिवनी यशो:- जिला चिकित्सालय के विशेष नवजात शिशु देखभाल इकाई (एसएनसीयू) में नवजात बच्चों की मौत का मामला अब राजनीतिक और सार्वजनिक बहस का विषय बन गया है। प्रदेश कांग्रेस सचिव राजा बघेल ने जिला चिकित्सालय प्रबंधन पर मौतों की संख्या के बजाय प्रतिशत के आधार पर आंकड़े प्रस्तुत कर वास्तविक स्थिति को कम करके दिखाने का आरोप लगाया है। जिला कांग्रेस कार्यालय इंदिरा भवन में आयोजित पत्रकारवार्ता में उन्होंने छह माह के दौरान 80 नवजातों की मौत से जुड़े आंकड़ों, उपचार व्यवस्था और स्वास्थ्य विभाग की जवाबदेही पर सवाल उठाए।राजा बघेल ने कहा कि यह मामला केवल आंकड़ों का नहीं, बल्कि उन परिवारों के दुख का है जिन्होंने अपने नवजात बच्चों को खोया है। उन्होंने आरोप लगाया कि इतने गंभीर मामले के बावजूद सत्तारूढ़ दल के किसी वरिष्ठ नेता ने पीड़ित परिवारों से मिलकर संवेदना व्यक्त करने की पहल नहीं की।80 नवजातों की मौत पर राजनीतिक नेतृत्व की चुप्पी का आरोपराजा बघेल ने कहा कि सिवनी जिला चिकित्सालय में नवजात बच्चों की मौत का मामला अत्यंत गंभीर और दुखद है। इसके बावजूद जनप्रतिनिधियों और राजनीतिक नेतृत्व की ओर से अपेक्षित संवेदनशीलता दिखाई नहीं दी। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा के वरिष्ठ नेता डॉ. ढालसिंह बिसेन को उत्तराखंड का राज्यपाल बनाए जाने के बाद पार्टी के नेताउत्सव में व्यस्त रहे, जबकि नवजातों की मौत के मामले पर गंभीर चर्चा तक नहीं हुई।उन्होंने छिंदवाड़ा में आयोजित भाजपा की संभागीय बैठक का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां भी इस मामले को प्रमुखता नहीं दी गई। कांग्रेस नेता ने सवाल उठाया कि जब स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ा इतना संवेदनशील विषय सामने है, तो जनप्रतिनिधियों को पीड़ित परिवारों के बीच पहुंचकर उनकी समस्याएं सुननी चाहिए।प्रतिशत नहीं, मौतों की स्पष्ट संख्या बताई जाएपत्रकारवार्ता में राजा बघेल ने जिला चिकित्सालय प्रबंधन द्वारा मृत्यु दर को प्रतिशत में प्रस्तुत किए जाने पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि छह माह में 80 नवजातों की मौत का आंकड़ा सामने आया है, इसलिए प्रबंधन को मौतों की संख्या, भर्ती बच्चों की स्थिति और उपचार के परिणामों की स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए।उन्होंने कहा कि प्रतिशत के आधार पर आंकड़े प्रस्तुत करने से आम लोगों के मन में वास्तविक स्थिति को लेकर भ्रम पैदा हो सकता है। प्रत्येक मृत नवजात के पीछे एक परिवार का दुख जुड़ा है। इसलिए इस विषय को केवल मृत्यु दर तक सीमित करने के बजाय प्रत्येक मामले की परिस्थितियों और संभावित कारणों की जांच की जानी चाहिए।कम वजन और समय से पहले जन्मे बच्चों का तर्क भी जांच के दायरे में आएराजा बघेल ने मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा कि अस्पताल प्रशासन की ओर से कुछ नवजातों के कम वजन, समय से पहले जन्म और गंभीर हालत में अस्पताल पहुंचने की बात कही गई है। उन्होंने माना कि गंभीर स्थिति में पहुंचने वाले प्रत्येक नवजात को बचा पाना हमेशा संभव नहीं होता, लेकिन इसके साथ ही उपचार की उपलब्धता, डॉक्टरों की संख्या, समय पर पहचान और रेफरल व्यवस्था की भी समीक्षा आवश्यक है।उन्होंने गर्भावस्था के दौरान जांच और चिकित्सकीय निगरानी की उपलब्धता का उल्लेख करते हुए सवाल उठाया कि जोखिम वाले मामलों की समय रहते पहचान कर प्रसव तथा नवजात की देखभाल के लिए पर्याप्त तैयारी क्यों नहीं सुनिश्चित की जाती।हालांकि, गर्भ में बच्चे का वजन जानने या समय से पहले जन्म की आशंका पहचानने भर से हर स्थिति में नवजात को बचाने की गारंटी नहीं होती। ऐसे मामलों में समय पर विशेषज्ञ उपचार, प्रसव की परिस्थितियां और जन्म के बाद उपलब्ध सुविधाएं भी महत्वपूर्ण होती हैं।छह माह के आंकड़ों का हवाला देकर उठाए सवालराजा बघेल के अनुसार, उपलब्ध आधिकारिक दस्तावेजों और मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए छह माह में एसएनसीयू में 1,088 नवजातों के भर्ती होने और उनमें से 80 की मृत्यु होने की बात कही गई। उन्होंने कुछ स्वास्थ्य संबंधी श्रेणियों के आंकड़े भी प्रस्तुत किए।पत्रकारवार्ता में बताए गए आंकड़े इस प्रकार हैं:विवरणसंख्याएसएनसीयू में भर्ती नवजात1,088बताई गई नवजात मृत्यु संख्या80कम वजन वाले नवजात60समय से पहले जन्मे नवजात58ऑक्सीजन की कमी से संबंधित मामले22मृत जन्मे बच्चों की संख्या39बताई गई मृत्यु दर7.4%महत्वपूर्ण तथ्य: इन श्रेणियों की परिभाषा और आंकड़ों के बीच संबंध की आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है। कम वजन, समय से पहले जन्म और ऑक्सीजन की कमी एक ही नवजात में एक साथ हो सकते हैं। इसी प्रकार मृत जन्मे बच्चों की संख्या को एसएनसीयू में भर्ती नवजातों की मृत्यु से अलग समझना जरूरी है। इसलिए इन संख्याओं को जोड़कर कुल मौतों का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।रेफरल व्यवस्था पर भी उठाए सवालकांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि जिला चिकित्सालय से गंभीर नवजातों को नागपुर और जबलपुर जैसे शहरों में रेफर किया जाता है और रेफरल के बाद होने वाली मौतों को एसएनसीयू की मृत्यु दर से अलग रखने के कारण पूरी तस्वीर सामने नहीं आती। उन्होंने दावा किया कि रेफर किए गए बच्चों की मौतों को भी शामिल किया जाए तो मृत्यु दर 10 प्रतिशत से अधिक हो सकती है।इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि के लिए रेफर किए गए बच्चों की संख्या, रेफरल के समय उनकी स्थिति, दूसरे अस्पतालों में भर्ती होने और उपचार के दौरान हुए परिणामों का रिकॉर्ड आवश्यक है। केवल रेफरल की संख्या के आधार पर मृत्यु दर 10 प्रतिशत से अधिक होने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।बघेल ने यह भी आरोप लगाया कि मृत्यु दर को एक निश्चित सीमा में बनाए रखने के लिए गंभीर बच्चों को रेफर किया जाता है। यह गंभीर आरोप है, जिसकी पुष्टि के लिए अस्पताल के रिकॉर्ड, रेफरल प्रोटोकॉल और स्वतंत्र जांच जरूरी होगी।दो दशक के शासन में स्वास्थ्य व्यवस्था की जवाबदेही तय हो: बघेलराजा बघेल ने कहा कि भाजपा लंबे समय से प्रदेश की सत्ता में है। ऐसे में जिला चिकित्सालयों में नवजातों की सुरक्षा, डॉक्टरों की उपलब्धता और उपचार व्यवस्था को लेकर सवाल उठने पर सरकार अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती।उन्होंने कहा कि सरकार की जिम्मेदारी केवल भवन बनाने और योजनाओं की घोषणा करने तक सीमित नहीं है, बल्कि नागरिकों की जान बचाना उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी है। नवजात बच्चे अपनी तकलीफ स्वयं नहीं बता सकते, इसलिए उनकी देखभाल और उपचार व्यवस्था में किसी भी तरह की कमी की गंभीरता से समीक्षा होनी चाहिए।विधायक दिनेश राय से इस्तीफे की मांगपत्रकारवार्ता के दौरान राजा बघेल ने सिवनी विधायक दिनेश राय मुनमुन को भी निशाने पर लिया। उन्होंने इस मामले की जांच कराने में सक्षम नहीं होने संबंधी कथित बयान को लेकर विधायक पर सवाल उठाए और इस्तीफे की मांग की।कांग्रेस नेता ने पूरे मामले में जवाबदेही तय करने की मांग करते हुए कहा कि नवजातों की मौत जैसे संवेदनशील विषय पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर तथ्यों के आधार पर जांच और सुधार की कार्रवाई होनी चाहिए।अब आधिकारिक आंकड़ों और जांच के निष्कर्षों पर नजरसिवनी जिला चिकित्सालय में नवजातों की मौत के मामले में वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए एसएनसीयू में भर्ती बच्चों की संख्या, मृत्यु के कारणों, रेफरल के बाद के परिणामों, डॉक्टरों की उपलब्धता और उपचार संबंधी रिकॉर्ड की समीक्षा महत्वपूर्ण है।राजा बघेल द्वारा लगाए गए आरोपों और प्रस्तुत आंकड़ों के साथ अस्पताल प्रबंधन तथा स्वास्थ्य विभाग का आधिकारिक पक्ष भी सामने आना चाहिए। निष्पक्ष जांच से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि मौतों के पीछे नवजातों की गंभीर स्वास्थ्य स्थितियों की क्या भूमिका थी और उपचार व्यवस्था में किसी प्रकार की कमी रही या नहीं।नवजातों की मौत का हर मामला संवेदनशील है। ऐसे में आंकड़ों की पारदर्शिता, पीड़ित परिवारों के प्रति संवेदनशीलता और स्वास्थ्य सेवाओं में आवश्यक सुधार सुनिश्चित करना सबसे महत्वपूर्ण है।