सहकारिता में हड़कंप: फर्जीवाड़े की सीमाएँ पार, संरक्षक अधिकारियों के हाथ-पैर फूले
तहसीलदार के आदेश पर एफआईआर, पर पटवारी-तहसील सत्यापन पर अब भी चुप्पी
लखनादौन मूंग खरीदी घोटाला—12 हजार क्विंटल की फर्जी खरीदी
Seoni 05 February 2026
सिवनी यशो:- ग्रामीण और किसान हित के उद्देश्य से गठित सहकारिता व्यवस्था, जिसे सहयोग और पारदर्शिता का पवित्र उपक्रम माना जाता है, सिवनी सहित पूरे प्रदेश में अपने मूल उद्देश्य से भटकती दिखाई दे रही है। सहकारिता की आड़ में सामने आ रहे लगातार घोटाले यह साफ़ कर रहे हैं कि यह व्यवस्था अब किसानों के हित की बजाय शोषण का माध्यम और सरकार पर आर्थिक बोझ बनती जा रही है।
इसी कड़ी में लखनादौन क्षेत्र में ग्रीष्मकालीन मूंग खरीदी घोटाले का बड़ा खुलासा हुआ है। मामले की जांच के बाद तहसीलदार लखनादौन ने लखनादौन पुलिस को एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए हैं। इस पूरे फर्जीवाड़े का मास्टरमाइंड आदिम जाति सेवा सहकारी समिति मर्यादित लखनादौन का प्रबंधक बताया जा रहा है, जिसके विरुद्ध भी आपराधिक प्रकरण दर्ज किया जाना है। आदेश जारी होते ही सहकारिता क्षेत्र में हड़कंप मच गया है।
सहकारिता की आड़ में करोड़ों का खेल
जानकारों के अनुसार, प्रदेश की अधिकांश सहकारी समितियाँ कागज़ों में घाटे में दर्ज हैं, जबकि उनमें पदस्थ कई कर्मचारी और पदाधिकारी कथित तौर पर करोड़पति हो चुके हैं। किसानों के नाम पर फर्जी ऋण, उपज उपार्जन में व्यापक धांधली, रिकॉर्ड में हेराफेरी और प्रशासनिक संरक्षण अब अपवाद नहीं, बल्कि सहकारिता तंत्र की पहचान बनते जा रहे हैं।
लखनादौन मूंग खरीदी घोटाला इसी सड़ते तंत्र का ताज़ा और गंभीर उदाहरण है।
ये है पूरा मामला
जानकारी के अनुसार, वर्ष 2024 में लखनादौन क्षेत्र में ग्रीष्मकालीन मूंग की खरीदी की गई थी। आदिम जाति सेवा सहकारी समिति मर्यादित लखनादौन द्वारा बिना किसी वैधानिक जांच के ऐसे किसानों से मूंग खरीदी गई, जिनके सिकमीनामा/ठेकानामा गलत और फर्जी पाए गए।
गंभीर बात यह रही कि जिन भूमि पर मूंग उत्पादन दर्शाया गया, उन भू-स्वामियों की न तो सहमति ली गई और न ही उनके हस्ताक्षर मौजूद थे। इसके बावजूद समिति द्वारा लगभग 12 हजार क्विंटल मूंग की खरीदी कर ली गई, जिससे शासन की उपार्जन व्यवस्था को सीधा आर्थिक नुकसान पहुँचा।
जांच में हुआ बड़ा खुलासा
शिकायत के बाद कराई गई जांच में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। जांच प्रतिवेदन की कंडिका-2 के अनुसार—
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लखनादौन क्षेत्र में बिना भू-स्वामी की सहमति सिकमीनामा/ठेकानामा निष्पादित किए गए।
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इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर मूंग की खरीदी कर ली गई।
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यह पूरा कृत्य धोखाधड़ी की श्रेणी में पाया गया।
जांच के दौरान उपलब्ध दस्तावेजों, साक्ष्यों और गवाहों से यह पुष्टि हुई कि मूंग खरीदी की प्रक्रिया पूरी तरह संदेहास्पद रही और सिकमी-ठेकानामा का उपयोग कर शासन की उपार्जन व्यवस्था को गुमराह करने का प्रयास किया गया।
इनके खिलाफ एफआईआर के आदेश
तहसीलदार द्वारा जिनके विरुद्ध एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए गए हैं, उनमें—
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तुलसीराम पिता ताराचंद्र डेहरिया, प्रबंधक, आदिम जाति सेवा सहकारी समिति मर्यादित लखनादौन
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कमलेश पिता बेनीप्रसाद यादव
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पार्वती पति जगदीश यादव
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पूनम पति कृष्णकुमार गोल्हानी
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राजेश पिता वीरनलाल डेहरिया
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गगन पिता मुकेश कुमार गोल्हानी
शामिल हैं। आरोप है कि इन लोगों ने सिकमीनामा के आधार पर मूंग विक्रय किया, जबकि संबंधित भूमि-स्वामियों की कोई सहमति नहीं ली गई थी।
राजस्व विभाग की भूमिका पर बड़ा सवाल
इस पूरे घोटाले में राजस्व विभाग की भूमिका भी गंभीर सवालों के घेरे में है।
पटवारी गिरदावली में यह स्पष्ट उल्लेख करता है कि किस किसान के खेत में कौन-सी फसल कितने रकबे में बोई गई है और सिकमीनामा की स्थिति क्या है। इसके बाद तहसीलदार द्वारा वैरीफिकेशन किया जाता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि—
👉 जब भू-स्वामियों की सहमति ही नहीं थी,
👉 तो सिकमीनामा वैरीफाई कैसे हो गया?
👉 और बिना वैध दस्तावेजों के मूंग की खरीदी कैसे हो गई?
इन सवालों के बावजूद राजस्व विभाग के किसी भी अधिकारी के खिलाफ अब तक न जांच हुई और न कार्रवाई, जिससे प्रशासनिक संरक्षण की आशंका और गहरी हो गई है।
कार्रवाई अधूरी, सच्चाई अब भी अधर में
तहसीलदार के आदेश पर एफआईआर दर्ज होना एक अहम कदम जरूर है, लेकिन केवल समिति प्रबंधक और कुछ किसानों पर कार्रवाई से पूरा सच सामने नहीं आएगा। जब तक राजस्व और उपार्जन तंत्र की भूमिका की निष्पक्ष व स्वतंत्र जांच नहीं होती, तब तक यह मामला अधूरा ही रहेगा।



