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आरक्षण: सामाजिक न्याय की व्यवस्था या नई सामाजिक चुनौती?

मुख्य संपादकीय | तथ्य, संविधान और वर्तमान परिप्रेक्ष्य

आरक्षण: सामाजिक न्याय की व्यवस्था या नई सामाजिक चुनौती?

भारतीय संविधान ने आरक्षण को किसी वर्ग को स्थायी विशेषाधिकार देने के लिए नहीं, बल्कि ऐतिहासिक सामाजिक और शैक्षणिक विषमताओं को कम करने के लिए एक सकारात्मक उपाय (Affirmative Action) के रूप में स्वीकार किया। संविधान सभा में भी यह अपेक्षा व्यक्त की गई थी कि जैसे-जैसे समाज में समान अवसर बढ़ेंगे, वैसे-वैसे ऐसी विशेष व्यवस्थाओं की आवश्यकता कम होती जाएगी। परंतु स्वतंत्रता के लगभग आठ दशक बाद भी आरक्षण केवल सामाजिक न्याय का विषय नहीं रहा, बल्कि राजनीति, चुनाव, न्यायालय और समाज—चारों के केंद्र में खड़ा एक अत्यंत संवेदनशील प्रश्न बन चुका है।

आज देश में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) सहित विभिन्न श्रेणियों में आरक्षण लागू है। कई राज्यों में कुल आरक्षण की सीमा को लेकर भी लगातार विवाद और न्यायिक परीक्षण होते रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि आरक्षण अब केवल एक नीति नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक विमर्श का विषय है।

इस व्यवस्था का सकारात्मक पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि आरक्षण न होता तो संभवतः समाज के अनेक वंचित वर्ग उच्च शिक्षा, प्रशासन, न्यायपालिका, चिकित्सा, इंजीनियरिंग और सरकारी सेवाओं में आज जितना प्रतिनिधित्व प्राप्त कर पाए हैं, उतना नहीं कर पाते। अनेक परिवारों का सामाजिक और आर्थिक उत्थान इसी नीति के माध्यम से हुआ है। यह उपलब्धि भारतीय लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण सफलता मानी जा सकती है।

किन्तु दूसरी ओर यह भी सत्य है कि समय के साथ आरक्षण को लेकर समाज में असंतोष, प्रतिस्पर्धा और राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ा है। लगभग प्रत्येक चुनाव में किसी न किसी वर्ग को नया आरक्षण देने या आरक्षण बढ़ाने की घोषणा राजनीतिक बहस का विषय बनती है। विभिन्न समुदाय समय-समय पर आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन करते हैं। इससे यह प्रश्न उठता है कि क्या आरक्षण का दायरा लगातार बढ़ाना ही सामाजिक न्याय का एकमात्र उपाय है, या फिर शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल विकास और आर्थिक अवसरों में सुधार पर अधिक बल दिया जाना चाहिए।

एक महत्वपूर्ण चिंता गुणवत्ता और सार्वजनिक उत्तरदायित्व से भी जुड़ी है। डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, वैज्ञानिक, न्यायिक अधिकारी और प्रशासनिक सेवाओं से जुड़े पद केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि करोड़ों नागरिकों के जीवन, सुरक्षा और भविष्य से जुड़े होते हैं। इसलिए इन पदों पर नियुक्त प्रत्येक व्यक्ति की क्षमता, प्रशिक्षण, नैतिकता और कार्यकुशलता सर्वोच्च स्तर की होनी चाहिए। यह उद्देश्य केवल चयन प्रक्रिया से नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कठोर प्रशिक्षण, नियमित मूल्यांकन और प्रभावी जवाबदेही से भी प्राप्त होता है।

सार्वजनिक चर्चा में कभी-कभी यह दावा किया जाता है कि आरक्षण के कारण गुणवत्ता में गिरावट आती है। दूसरी ओर अनेक अध्ययन यह भी बताते हैं कि अवसर मिलने पर आरक्षित वर्ग के विद्यार्थी और अधिकारी भी उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हैं। इसलिए किसी भी पूरे वर्ग को स्वभावतः अयोग्य या योग्य मान लेना न तो तथ्यपरक है और न ही न्यायसंगत। किसी भी समुदाय के बारे में व्यापक निष्कर्ष निकालना सामाजिक सौहार्द के लिए भी उचित नहीं है।

एक और गंभीर प्रश्न यह है कि क्या आरक्षण की राजनीति समाज में वर्गीय तनाव बढ़ा रही है? दुर्भाग्य से सार्वजनिक विमर्श में कई बार ऐसी भाषा देखने को मिलती है जो समाज के विभिन्न वर्गों के बीच कटुता पैदा करती है। किसी भी वर्ग के प्रति अपमानजनक टिप्पणियाँ, घृणा या सामूहिक दोषारोपण लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं हैं। यदि आरक्षण का प्रश्न सामाजिक न्याय से हटकर सामाजिक संघर्ष का कारण बनने लगे, तो यह पूरे समाज के लिए चिंता का विषय है।

यह भी विचारणीय है कि आज भी देश के अनेक गरीब परिवार ऐसे हैं जो आरक्षित श्रेणियों से बाहर हैं और सीमित संसाधनों के साथ कठिन प्रतिस्पर्धा का सामना करते हैं। वहीं आरक्षित वर्गों के भीतर भी अपेक्षाकृत अधिक लाभान्वित और अत्यंत वंचित समूहों के बीच असमानताएँ बनी हुई हैं। इस कारण नीति-निर्माताओं के सामने यह चुनौती है कि लाभ वास्तव में उन लोगों तक पहुँचे जिन्हें उसकी सबसे अधिक आवश्यकता है।

आरक्षण पर बहस का समाधान भावनाओं या चुनावी नारों से नहीं निकलेगा। इसके लिए व्यापक सामाजिक संवाद, विश्वसनीय आँकड़ों, समय-समय पर नीति की समीक्षा और शिक्षा व्यवस्था में बड़े सुधार आवश्यक हैं। यदि प्रारंभिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक सभी बच्चों को समान गुणवत्ता के विद्यालय, प्रशिक्षित शिक्षक, आधुनिक संसाधन और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के अवसर उपलब्ध कराए जाएँ, तो सामाजिक न्याय और योग्यता के बीच की दूरी स्वतः कम होगी।

भारत का भविष्य केवल आरक्षण बढ़ाने या घटाने से तय नहीं होगा। वह इस बात से तय होगा कि क्या हम प्रत्येक नागरिक को उसकी क्षमता विकसित करने का अवसर दे पा रहे हैं, क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था समान गुणवत्ता प्रदान कर रही है, और क्या सार्वजनिक संस्थानों में जवाबदेही तथा उत्कृष्टता सुनिश्चित की जा रही है।

आरक्षण संविधान की देन है और जब तक यह लागू है, उसका सम्मान होना चाहिए। साथ ही, किसी भी सार्वजनिक नीति की तरह उसकी समय-समय पर समीक्षा, प्रभाव का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन और सुधार की संभावना पर विचार करना भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा है। सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय उत्कृष्टता विरोधी लक्ष्य नहीं हैं; चुनौती उन्हें संतुलित करने की है।

भारत को ऐसे भविष्य की आवश्यकता है जहाँ किसी नागरिक की पहचान उसकी जाति से पहले उसकी क्षमता, चरित्र और कर्म से हो; जहाँ सामाजिक न्याय और समान अवसर साथ-साथ चलें; और जहाँ कोई भी नीति समाज को जोड़ने का माध्यम बने, विभाजन का नहीं। यही संविधान की मूल भावना भी है और राष्ट्र निर्माण का सबसे सशक्त मार्ग भी।

“निस्संदेह, आरक्षण का मूल उद्देश्य सामाजिक और शैक्षणिक रूप से वंचित वर्गों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ना है। यह भारतीय संविधान की सामाजिक न्याय की भावना का महत्वपूर्ण अंग है। किंतु यदि इस व्यवस्था का उपयोग केवल राजनीतिक लाभ, वोट बैंक या तुष्टिकरण की नीति के रूप में होने लगे, और उसके कारण गुणवत्ता, योग्यता, दक्षता तथा उत्तरदायित्व जैसे मूल मानकों से समझौता किया जाए, तो उसका दुष्परिणाम पूरे समाज और राष्ट्र को भुगतना पड़ता है। ऐसी स्थिति में केवल वर्तमान ही नहीं, आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी प्रभावित होता है तथा सुदृढ़ संस्थाएँ कमजोर पड़ने लगती हैं। इसलिए आवश्यक है कि सामाजिक न्याय और उत्कृष्टता—दोनों के बीच ऐसा संतुलन स्थापित किया जाए, जिससे न तो किसी वंचित वर्ग के अधिकारों की उपेक्षा हो और न ही राष्ट्र की प्रशासनिक, शैक्षणिक, तकनीकी और स्वास्थ्य संबंधी व्यवस्थाओं की गुणवत्ता से समझौता किया जाए। यही संविधान की भावना और विकसित भारत की वास्तविक दिशा भी है।”

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https://journals.sagepub.com/doi/abs/10.1177/09737030221120475

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