लोकतंत्र किसी राजनीतिक दल की सत्ता प्राप्ति का साधन या किसी परिवार की निजी विरासत नहीं, बल्कि जनता के विश्वास, संविधान की मर्यादा और जनादेश की सर्वोच्चता पर आधारित व्यवस्था है। दुर्भाग्य है कि चुनाव में जनता का समर्थन नहीं मिलने पर विपक्ष का एक वर्ग अपनी राजनीतिक विफलता स्वीकार करने के बजाय संवैधानिक संस्थाओं को कटघरे में खड़ा कर लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा करने में जुट जाता है।
भारत का लोकतंत्र विश्व की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक व्यवस्था होने के साथ हमारी राष्ट्रीय अस्मिता और संवैधानिक गौरव का प्रतीक है। इसकी मजबूती का आधार स्वतंत्र चुनाव, निष्पक्ष संस्थाएं, कानून का शासन और जनता का सर्वोच्च अधिकार है। लेकिन आज देश के राजनीतिक परिदृश्य में एक ऐसी प्रवृत्ति चिंताजनक रूप से सामने आ रही है, जिसमें लोकतंत्र की दुहाई देने वाले कुछ विपक्षी दल जनता के निर्णय को स्वीकार करने के बजाय अपनी राजनीतिक पराजय का ठीकरा संवैधानिक संस्थाओं पर फोड़ने का प्रयास करते हैं।
विशेषकर कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों की राजनीति में यह सवाल बार-बार उठता है कि चुनाव परिणाम अनुकूल हों तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया स्वीकार्य और प्रतिकूल हों तो वही प्रक्रिया संदिग्ध कैसे हो जाती है? क्या लोकतंत्र का अर्थ केवल वही परिणाम स्वीकार करना है, जो विपक्ष की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के अनुकूल हो? जनता का जनादेश अपने पक्ष में हो तो लोकतंत्र की जीत और विपक्ष में हो तो लोकतंत्र खतरे में—यह दोहरा राजनीतिक चरित्र आखिर कब तक चलेगा?
चुनाव में पराजय किसी भी राजनीतिक दल के लिए आत्ममंथन का अवसर होनी चाहिए। उसे अपनी नीतियों, नेतृत्व, संगठन और जनसंपर्क की समीक्षा करनी चाहिए। लेकिन अपनी कमजोरियों को स्वीकार करने के बजाय निर्वाचन आयोग और संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर लगातार प्रश्नचिह्न लगाना राजनीतिक हताशा का परिचायक है। यदि चुनाव प्रक्रिया में किसी प्रकार की अनियमितता है तो प्रमाण प्रस्तुत किए जाएं, निर्वाचन आयोग के समक्ष शिकायत दर्ज हो और न्यायालय में वैधानिक लड़ाई लड़ी जाए। देश में इसके लिए पूरी संवैधानिक व्यवस्था उपलब्ध है।
लोकतंत्र में किसी संस्था को आलोचना से परे नहीं माना जा सकता। संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाना और आवश्यक सुधारों की मांग करना नागरिकों एवं राजनीतिक दलों का अधिकार है। लेकिन प्रमाणों के बिना आरोपों को राजनीतिक अभियान बनाना, न्यायिक एवं संवैधानिक प्रक्रियाओं पर भी अविश्वास जताना और जनता के बीच भ्रम फैलाना स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा नहीं हो सकती।
यदि विपक्ष को वास्तव में अपने जनसमर्थन पर भरोसा है, तो उसे जनता के बीच जाकर अपना पक्ष रखना चाहिए। चुनाव लोकतंत्र का सबसे बड़ा जनमंच है। अपनी नीतियों और विचारधारा के आधार पर जनमत प्राप्त करना चाहिए। जनता का निर्णय स्वीकार करना ही लोकतांत्रिक परिपक्वता है। जनादेश को नकारकर लोकतंत्र बचाने का दावा करना राजनीतिक विरोधाभास है।
विपक्ष लोकतंत्र का अनिवार्य अंग है। सरकार की आलोचना करना, जनहित के मुद्दे उठाना, नीतियों में कमियां बताना और वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करना उसकी जिम्मेदारी है। लेकिन विपक्ष की भूमिका केवल विरोध, आरोप और राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने तक सीमित नहीं हो सकती। सत्ता प्राप्त करने की बेचैनी में देश की संस्थाओं और लोकतांत्रिक व्यवस्था की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने वैश्विक मंच पर अपनी आर्थिक, सामरिक और कूटनीतिक पहचान को नई मजबूती प्रदान की है। गरीब कल्याण, आधारभूत संरचना, डिजिटल क्रांति, महिला सशक्तीकरण, किसान सम्मान और आत्मनिर्भर भारत जैसे विषय राष्ट्रीय विकास की प्राथमिकताओं में शामिल हुए हैं। सरकार की नीतियों की समीक्षा और आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन राजनीतिक विरोध के नाम पर देश की उपलब्धियों को नकारना और हर राष्ट्रीय विषय को सत्ता संघर्ष के चश्मे से देखना दुर्भाग्यपूर्ण है।
देश के सामने आज रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों की समृद्धि, महिला सुरक्षा और युवाओं के भविष्य जैसे अनेक महत्वपूर्ण प्रश्न हैं। इन विषयों पर सार्थक बहस होनी चाहिए। विपक्ष इन मुद्दों पर सरकार को जवाबदेह बनाए, यह लोकतंत्र की आवश्यकता है। लेकिन जब राजनीतिक विमर्श केवल चुनावी आरोपों, संस्थाओं पर अविश्वास और आंदोलन की राजनीति तक सिमट जाता है, तब जनता के वास्तविक प्रश्न पीछे छूट जाते हैं।
यह भी समझना होगा कि लोकतांत्रिक अधिकारों की आड़ में हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान, कानून की अवहेलना और सामाजिक तनाव पैदा करने की प्रवृत्तियों को वैचारिक स्वतंत्रता नहीं कहा जा सकता। विरोध का अधिकार है, लेकिन विरोध की भी संवैधानिक मर्यादा है। असहमति लोकतंत्र की शक्ति है, अराजकता उसकी कमजोरी। विचारों का संघर्ष होना चाहिए, लेकिन राष्ट्र की एकता और संवैधानिक व्यवस्था को कमजोर करने का प्रयास स्वीकार्य नहीं हो सकता।
भारत की जनता राजनीतिक रूप से पहले से अधिक जागरूक है। वह विकास और विनाश की राजनीति, रचनात्मक विरोध और नकारात्मकता, लोकतांत्रिक अधिकार और राजनीतिक स्वार्थ के बीच अंतर समझती है। अब केवल लोकतंत्र खतरे में होने का नारा देकर जनता का विश्वास हासिल नहीं किया जा सकता। जनता को जवाब चाहिए कि देश के विकास में विपक्ष की सकारात्मक भूमिका क्या है और वह अपनी राजनीतिक जिम्मेदारियों का निर्वहन किस प्रकार कर रहा है?
लोकतंत्र की रक्षा किसी एक राजनीतिक दल का दायित्व नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की सामूहिक जिम्मेदारी है। इसके लिए संविधान के प्रति निष्ठा, कानून में विश्वास, संस्थाओं की गरिमा और जनता के जनादेश का सम्मान अनिवार्य है। राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि सत्ता स्थायी नहीं होती, लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता और राष्ट्र की प्रतिष्ठा स्थायी महत्व रखती है।
विपक्ष को यह आत्ममंथन करना चाहिए कि वह लोकतंत्र को मजबूत करने की राजनीति कर रहा है या अपनी राजनीतिक विफलताओं को छिपाने के लिए लोकतंत्र के नाम पर अविश्वास का वातावरण बना रहा है। जनता के फैसले को स्वीकार करने का साहस ही लोकतांत्रिक चरित्र की असली कसौटी है।
भारत को ऐसा लोकतांत्रिक वातावरण चाहिए जहां सरकार जवाबदेह हो, विपक्ष जिम्मेदार हो, संवैधानिक संस्थाएं स्वतंत्र एवं प्रतिष्ठित रहें और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा राष्ट्रहित की सीमाओं का सम्मान करे। लोकतंत्र को कमजोर करने वाली नकारात्मकता और अराजकता के विरुद्ध समाज को जागरूक होना ही होगा।
लोकतंत्र केवल सत्ता बदलने की व्यवस्था नहीं, बल्कि जनविश्वास को बनाए रखने की राष्ट्रीय प्रतिबद्धता है। इसलिए समय की मांग है कि राजनीतिक स्वार्थ से ऊपर उठकर संविधान, जनादेश और राष्ट्रहित को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।
लोकतंत्र बचाना है तो जनादेश का सम्मान करना होगा, संवैधानिक संस्थाओं पर विश्वास बनाए रखना होगा और राजनीतिक हताशा को अराजकता में बदलने की प्रवृत्ति का विरोध करना होगा। भारत का लोकतंत्र किसी के राजनीतिक अहंकार से नहीं, बल्कि जनता की शक्ति से चलता है।
— सुजीत जैन
पूर्व जिला अध्यक्ष एवं कटनी संगठन प्रभारी