आदिवासी नाबालिग प्रसव मामला: पति बनकर युवक ने बदला नाम, स्वास्थ्य केंद्र में खेल—न बच्ची का पता, न डिलेवरी की पुष्टि
स्वास्थ्य तंत्र, पुलिस और बाल संरक्षण व्यवस्था की चूक से आरोपी फरार, प्रशासन सवालों के घेरे में
Seoni 03 January 2026
सिवनी यशो:- घंसौर थाना क्षेत्र अंतर्गत ग्राम बटवानी से सामने आया 15 वर्षीय आदिवासी नाबालिग बालिका के कथित प्रसव का मामला अब केवल सामाजिक अपराध नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही, पुलिस निष्क्रियता और स्वास्थ्य तंत्र में गहरी साठगांठ का गंभीर उदाहरण बन चुका है। घटना को दस दिन से अधिक समय बीत जाने के बाद भी प्रशासन यह स्पष्ट नहीं कर पा रहा है कि नाबालिग बालिका कहां है, उसकी डिलेवरी वास्तव में हुई या नहीं, और यदि हुई तो किस स्वास्थ्य केंद्र में।
पति बनकर युवक ने बदला नाम, उम्र—स्वास्थ्य केंद्र में गंभीर अनियमितता
प्रकरण के अनुसार 23 दिसंबर 2025 को आंगनवाड़ी कार्यकर्ता द्वारा महिला एवं बाल विकास विभाग, महिला हेल्पलाइन 1090 तथा पुलिस को सूचना दी गई कि जन्मतिथि 01-11-2010 की नाबालिग बालिका को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र कहानी में प्रसव हेतु भर्ती कराया गया है।
दस्तावेजों में बालिका की उम्र स्पष्ट रूप से 15 वर्ष दर्ज है।
आरोप है कि साथ मौजूद युवक ने स्वयं को पति बताकर अस्पताल पंजीयन रजिस्टर में नाम और उम्र बदल दी, बालिका को 19 वर्षीय वयस्क महिला दर्शाया गया, जिससे पॉक्सो एक्ट और बाल विवाह कानून से बचने की कोशिश की गई। यह घटना स्वास्थ्य केंद्र की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है।
सूचना के बाद भी पुलिस की देरी, आरोपी को मिला फरार होने का मौका
सूचना मिलने के बावजूद घंसौर पुलिस समय पर मौके पर नहीं पहुंची। इसी दौरान आरोपी युवक को परिजनों द्वारा मोटरसाइकिल से फरार करा दिया गया।
नाबालिग बालिका को ग्राम पंचायत बटवानी की बुलेरो जीप से लखनादौन की ओर भेजा गया, जिसकी पुष्टि स्वयं जीप चालक ने की है।
मौके पर पहुंची पुलिस, पर सिर्फ औपचारिकता
पुलिस के पहुंचने के बाद भी
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अस्पताल स्टाफ के बयान दर्ज नहीं किए गए,
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रजिस्टर और CCTV फुटेज जब्त नहीं किए गए,
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चिकित्सकीय पुष्टि नहीं कराई गई।
केवल फोटो खींचकर कार्रवाई का दिखावा किया गया। जबकि आंगनवाड़ी कार्यकर्ता द्वारा उपलब्ध आधार कार्ड और अंकसूची में उम्र निर्विवाद रूप से दर्ज थी।
न जिला बाल संरक्षण समिति को स्पष्ट जानकारी
सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि जिला बाल कल्याण समिति जैसे संवेदनशील निकाय के अध्यक्ष भी इस मामले में केवल “औपचारिक सूचना” मिलने की बात कह रहे हैं।
इतने गंभीर अपराध में यह जवाब स्वयं प्रशासनिक संवेदनहीनता को उजागर करता है।
डर और दबाव में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता
शिकायतकर्ता आंगनवाड़ी कार्यकर्ता पर जातिगत और सामाजिक दबाव, धमकी और सरकारी योजनाओं का गलत लाभ दिलाने का दबाव बनाए जाने के आरोप भी सामने आए हैं।
कार्यकर्ता ने पुलिस अधीक्षक से सुरक्षा और निष्पक्ष कार्रवाई की मांग की है।
डिलेवरी कहां हुई? जिला अस्पताल पहुंची ही नहीं बच्ची
जानकारी के अनुसार गर्भवती को सिवनी जिला चिकित्सालय रेफर किया गया था, लेकिन वह वहां कभी पहुंची ही नहीं।
अब यह दावा किया जा रहा है कि छपारा क्षेत्र में प्रसव कराया गया, लेकिन इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि, रिकॉर्ड या चिकित्सकीय दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं।
कानूनों पर सीधा हमला
यह पूरा मामला
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बेटी बचाओ–बेटी पढ़ाओ,
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बाल विवाह निषेध अधिनियम,
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पॉक्सो एक्ट,
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स्वास्थ्य विभाग की जवाबदेही
पर सीधा प्रहार है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि
नाबालिग बच्ची कहां है?
प्रसव हुआ या नहीं?
आरोपी कैसे फरार हुआ? सूचना तंत्र किसके संरक्षण में निष्क्रिय रहा?
विभागीय अधिकारियों के बयान
मनोज लारोकर, जिला परियोजना अधिकारी:
“मुझे इस विषय में कोई जानकारी नहीं है। ”
धर्मेंद्र उइके, परियोजना अधिकारी घंसौर:
“मामला हमारे संज्ञान में आया था। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ने पुलिस को सूचना दे दी थी। यह प्रकरण छपारा परियोजना क्षेत्र से संबंधित बताया जा रहा है। हमारे क्षेत्र में केवल डिलेवरी से जुड़ा पक्ष सामने आया था।”
थाना प्रभारी का कथन
थाना प्रभारी, घंसौर:
“मामले की जानकारी प्राप्त हुई है। तथ्यों की जांच की जा रही है। सूचना मिलने पर एएसआई को मौके पर भेजा गया था, लेकिन बताए गए स्थान पर ताला बंद मिला और आरोपी फरार हो चुके थे। जो भी तथ्य सामने आएंगे, उनके आधार पर विधिसम्मत कार्रवाई की जाएगी।”
निष्कर्ष
यदि इस मामले में उच्चस्तरीय, स्वतंत्र और समयबद्ध जांच नहीं हुई, तो यह प्रकरण प्रशासनिक इतिहास में लापरवाही, संवेदनहीनता और मिलीभगत का स्थायी उदाहरण बनकर रह जाएगा।



