द्वारकाधीश मंदिर में पुष्पाधिवास, भागवत कथा में भक्ति–ज्ञान–वैराग्य का गूढ़ संदेश
>श्री मद्भागवत में ही मानव जीवन के सुख का स्थायी मार्ग
द्वारकाधीश मंदिर सिवनी
Seoni 23 February 2026
सिवनी यशो:- नगर के द्वार पर नवनिर्मित भगवान द्वारकाधीश मंदिर में आज प्रतिष्ठित किए जाने वाले श्री राधा–कृष्ण विग्रह को पुष्पों से आच्छादित कर पुष्पाधिवास का शास्त्रीय अनुष्ठान किया जा रहा है। इसी क्रम में मंदिर प्रांगण स्थित भव्य सत्संग भवन में श्री मद्भागवत कथा का भावपूर्ण आयोजन चल रहा है।

संसार के मोह में उलझा मनुष्य परमात्मा को समझ ही नहीं पाता
कथा के दौरान द्वारका शारदा पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती महाराज ने आशीर्वचन देते हुए कहा कि मनुष्य परमात्मा को समझने का प्रयास ही नहीं करता। जिस संसार में उसका जन्म हुआ है, वह इतना रमणीय और आकर्षक प्रतीत होता है कि उसकी बुद्धि उसी के भोग-विलास में उलझकर रह जाती है।
उन्होंने कहा कि जब तक प्राणी अपना समय और मन भगवत भजन और सत्संग में नहीं लगाएगा, तब तक मनुष्य जीवन की सार्थकता प्राप्त नहीं हो सकती।
श्री मद्भागवत में ही सुख का स्थायी मार्ग निहित
पूज्य शंकराचार्य जी महाराज ने कहा कि परमात्मा ने स्वयं ऋषियों को श्री मद्भागवत का उपदेश देकर सुख प्राप्ति का उपाय इसी ग्रंथ में स्थापित कर दिया है। इसी कारण श्री मद्भागवत का प्रवर्तन हुआ।
संत और महात्मा जीवों के कल्याण के लिए निरंतर श्री मद्भागवत का उपदेश करते हुए लोक में विचरण करते रहते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि जीवों और मनुष्यों के वास्तविक सुख का एकमात्र उपाय भगवान की भागवत कथा का निरंतर श्रवण है।

सत्संग से होता है हृदय परिवर्तन
इसी दौरान आचार्य महामंडलेश्वर अग्निपीठाधीश्वर ब्रह्मर्षि श्री रामकृष्णानंद जी महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि आज लोग पूछते हैं कि सत्संग क्यों करें और उससे क्या लाभ है।
उन्होंने कहा कि यदि आप सांसारिक व्यक्ति के पास बैठेंगे तो वह संसार की बातें करेगा, किंतु संत, साधु और महापुरुषों के सान्निध्य में बैठने से परमार्थ की चर्चा प्राप्त होती है। सत्संग मनुष्य के हृदय में परिवर्तन लाकर उसका परलोक सुधार देता है।
चार आश्रम – जीवन को क्रमबद्ध करने की सनातन व्यवस्था
श्री मद्भागवत कथा के तृतीय दिवस कथा व्यास गीता मनीषी स्वामी निर्विकल्प स्वरूप जी महाराज ने धर्मशास्त्रों में वर्णित चार आश्रमों—ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास—का विस्तार से वर्णन किया।
उन्होंने बताया कि ब्रह्मचर्य आश्रम में बालक गुरुकुल में रहकर गुरु सेवा और वेदाध्ययन करता है। शिक्षा पूर्ण होने पर वह गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कर पितृ तर्पण, परिवार और समाज के कर्तव्यों का निर्वहन करता है।
इसके बाद वानप्रस्थ आश्रम में विषयों से विरक्ति लेकर तप और साधना द्वारा जीवन को संयमित किया जाता है। अंत में संन्यास आश्रम में प्रवेश कर पुत्रेष्णा, वित्तेष्णा और लोकेष्णा का त्याग कर आत्मा में रमण किया जाता है।
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भगवान पक्षपाती नहीं, भाव के अधीन होते हैं
कथा में राजा परीक्षित और शुकदेव जी के संवाद का उल्लेख करते हुए बताया गया कि भगवान निर्गुण, निराकार और समभावी हैं।
जो भी व्यक्ति जिस भाव से भगवान का स्मरण करता है, उसी भाव से उसका उद्धार होता है। भगवान अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और उनके भाव के अधीन हो जाते हैं।
जड़ भरत की कथा से ज्ञान–भक्ति का समन्वय
कथाचार्य स्वामी निर्विकल्प स्वरूप जी महाराज ने जड़ भरत के तीन जन्मों, उनके त्याग, वैराग्य तथा राजा रहूगण को दिए गए उपदेश की कथा का भावपूर्ण वर्णन किया।
उन्होंने बताया कि भक्ति मार्ग में ज्ञान मार्ग को श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि ज्ञान से भक्ति स्थिर और अडिग होती है।



