सिवनी जैन बड़ा मंदिर में दशलक्षण महापर्व: ‘उत्तम त्याग धर्म’ पर प्रवचन, दान–सेवा और संयम का आह्वान
मुनि श्री धर्मसागर जी व मुनि श्री भावसागर जी के सान्निध्य में मांगलिक क्रियाएं संपन्न; अनेक साधकों के 8 उपवास जारी, गुप्त दान और लोककल्याण पर बल
Seoni 04 September 2025
सिवनी यशो:- श्री पारसनाथ दिगंबर जैन बड़ा मंदिर, सिवनी (म.प्र.) में दशलक्षण महापर्व के अंतर्गत ‘उत्तम त्याग धर्म’ पर आधारित कार्यक्रम श्रद्धा और अनुशासन के साथ संपन्न हुए। आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के शिष्य मुनि श्री धर्मसागर जी महाराज एवं मुनि श्री भावसागर जी महाराज के सान्निध्य में प्रातःकाल अभिषेक, विशिष्ट मंत्र शांतिधारा और दशलक्षण महापर्व पूजन सम्पन्न हुआ। दोपहर सत्र में तत्त्वार्थ सूत्र वाचन और मुनि श्री धर्मसागर जी द्वारा धर्म–कक्षा, रात्रि में महाआरती तथा अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त योगाचार्य डॉ. नवीन जैन के प्रवचन हुए। अनेक साधकों के 8 उपवास भी चल रहे हैं, जबकि श्रद्धालुओं ने शास्त्र अर्पण किया।
दशलक्षण महापर्व — उत्तम त्याग धर्म
- क्या: आत्मशुद्धि के दस धर्मों में से एक—त्याग, आसक्ति–त्याग का अभ्यास
- क्यों: राग–द्वेष का क्षय, करुणा–सेवा का विस्तार
- कैसे: उपवास, पूजन, शास्त्र–वाचन, दान–परोपकार, संयमित दिनचर्या
- लाभ: व्यक्ति–समाज–राष्ट्र का नैतिक उत्थान
धर्मसभा में मुनि श्री भावसागर जी ने कहा कि “दान के प्रति उल्लास होना चाहिए—हर्ष, आनंद और पुलक से दिया गया दान लोककल्याण का साधन बनता है। दान से अनिष्ट का निराकरण होता है और समाज, देश व संस्कृति का उत्थान होता है।” उन्होंने मंदिर–व्यवस्था में सहयोग को “नगर के हीरे” बताते हुए गुप्त दान के महत्त्व पर बल दिया: “गुप्त दान से करोड़ गुना पुण्य फलित होता है।”
मुनि श्री ने त्याग–धर्म का सार बताते हुए कहा कि “त्याग सर्वस्व का होता है, दान अंश का; भावों से रिश्ते का त्याग ही सच्चा त्याग है।” उन्होंने अभयदान की महिमा, संयमित जीवन और लोकहितकारी योजनाओं—गौशाला, पाठशाला, मंदिर व परोपकार—के लिए संसाधन जुटाने का आह्वान किया। श्रद्धालुओं से आग्रह किया गया कि बैंक–नाम–प्रसिद्धि की चाह से परे रहकर गोपनीय, निष्काम दान द्वारा समाज–निर्माण में सहयोग करें।
प्रमुख संदेश
-
दान–सेवा में उल्लास: “रोम–रोम पुलकित हो—तभी दान सार्थक।”
-
गुप्त दान की महिमा: “गुप्त दान करोड़ गुना पुण्य देता है।”
-
त्याग–धर्म का केंद्र: “त्याग सर्वस्व का, दान अंश का; भाव–त्याग ही सच्चा त्याग।”
-
लोककल्याण लक्ष्य: “समाज, संस्कृति और राष्ट्र का उत्थान—दान का सर्वोच्च फल।”
-
उपवास–अनुष्ठान: अनेक साधकों के 8 उपवास प्रगति पर; शास्त्र–अर्पण सम्पन्न।



