अवैध कॉलोनाइजरों पर कार्रवाई के दावों के बीच नगर निगम की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल; महत्वपूर्ण शाखा की जिम्मेदारी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को सौंपने पर भी नाराजगी, भाजपा नेता कमिश्नर से करेंगे चर्चा
Chhindwara 04 November 2026
छिंदवाड़ा यशो:- नगर निगम अवैध कॉलोनियों के खिलाफ सख्ती बरतने और नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कार्रवाई के दावे तो कर रहा है, लेकिन जमीनी तस्वीर इन दावों पर सवाल खड़े कर रही है। नगर निगम क्षेत्र में 80 से अधिक कॉलोनियों को अवैध घोषित किया जा चुका है, लेकिन जानकारी के अनुसार अब तक केवल 38 भूमि स्वामियों एवं कॉलोनाइजरों के विरुद्ध ही एफआईआर दर्ज कराई गई है। शेष अवैध कॉलोनियों के जिम्मेदारों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई, यह बड़ा सवाल है। आखिर किन कारणों से कुछ कॉलोनाइजरों पर पुलिस कार्रवाई हुई और बाकी को अब तक राहत मिल रही है?
मामला केवल कार्रवाई में देरी तक सीमित नहीं है। नगर निगम में कॉलोनाइजर शाखा जैसे महत्वपूर्ण कामकाज की जिम्मेदारी एक चपरासी के हाथों में होने की चर्चा भी अब निगम के गलियारों में उठ रही है। सवाल यह है कि जिस शाखा के माध्यम से अवैध कॉलोनियों और कॉलोनाइजरों से जुड़े महत्वपूर्ण प्रशासनिक कार्य संचालित होते हैं, उसकी जिम्मेदारी किसी लिपिकीय संवर्ग के अनुभवी कर्मचारी को सौंपने के बजाय चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को क्यों दी गई है?
80 से अधिक अवैध कॉलोनियां, कार्रवाई सिर्फ 38 पर!
नगर निगम क्षेत्र में 80 से अधिक कॉलोनियों को अवैध घोषित किए जाने की जानकारी सामने आई है। इसके बावजूद अब तक मात्र 38 भूमि स्वामियों अथवा कॉलोनाइजरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराए जाने की बात कही जा रही है। शेष मामलों में कार्रवाई नहीं होने से निगम की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं।
यदि नगर निगम ने इन कॉलोनियों को अवैध घोषित कर दिया है तो फिर संबंधित भूमि स्वामियों और कॉलोनाइजरों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई करने में देरी क्यों हो रही है? क्या सभी मामलों में समान रूप से कार्रवाई की जा रही है या कुछ मामलों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है? निगम प्रशासन को इसका जवाब देना चाहिए।
कॉलोनाइजर शाखा की कमान चपरासी के पास, व्यवस्था पर सवाल
नगर निगम के भीतर कॉलोनाइजर शाखा की जिम्मेदारी एक चपरासी को सौंपे जाने को लेकर भी असंतोष की चर्चा है। निगम के कुछ लोगों का मानना है कि यह महत्वपूर्ण कार्य किसी एलडीसी अथवा यूडीसी स्तर के कर्मचारी को सौंपा जाना चाहिए, ताकि अभिलेखों, नोटिस, प्रकरणों और कार्रवाई की प्रक्रिया व्यवस्थित ढंग से संचालित हो सके।
सवाल यह भी है कि इतनी महत्वपूर्ण शाखा में जिम्मेदारी तय करने के लिए प्रशासनिक मापदंड क्या अपनाए गए? क्या संबंधित कर्मचारी को इस कार्य के लिए विधिवत आदेश जारी किया गया है? यदि हां, तो उसकी जिम्मेदारियां और जवाबदेही क्या निर्धारित की गई हैं?
एफआईआर के नाम पर कथित लेन-देन की चर्चाएं, जांच की उठी मांग
निगम के गलियारों में यह चर्चा भी है कि अवैध कॉलोनाइजरों के विरुद्ध एफआईआर की प्रक्रिया में कथित तौर पर अनियमितताएं हो रही हैं। कुछ लोगों द्वारा आरोप लगाए जा रहे हैं कि कार्रवाई के नाम पर चुनिंदा मामलों में ही तेजी दिखाई जाती है, जबकि अन्य मामलों में कथित लेन-देन के जरिए राहत देने की कोशिश होती है।
हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में नगर निगम प्रशासन को एफआईआर दर्ज कराने वाले सभी मामलों, लंबित प्रकरणों और संबंधित फाइलों की निष्पक्ष जांच करानी चाहिए, ताकि यदि किसी स्तर पर अनियमितता हुई है तो जिम्मेदारों की पहचान हो सके।
भाजपा नेता ने कमिश्नर से चर्चा करने की बात कही
इस पूरे मामले को लेकर भाजपा के एक नेता ने भी नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि अवैध कॉलोनियों के खिलाफ कार्रवाई में पारदर्शिता होनी चाहिए और सभी मामलों में समान रूप से नियमों का पालन किया जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि वे जल्द ही इस संबंध में नगर निगम कमिश्नर से चर्चा करेंगे और कॉलोनाइजर शाखा की जिम्मेदारी तथा लंबित एफआईआर के मामलों को उनके सामने रखेंगे।
निगम प्रशासन से जवाब मांगते सवाल
नगर निगम के सामने अब कई सवाल हैं। 80 से अधिक अवैध कॉलोनियों में से केवल 38 मामलों में ही एफआईआर क्यों दर्ज हुई? शेष मामलों में कार्रवाई की स्थिति क्या है? कॉलोनाइजर शाखा की जिम्मेदारी चपरासी को सौंपने का आधार क्या है? क्या एफआईआर की प्रक्रिया में किसी तरह का पक्षपात या अनियमितता हुई है?
अवैध कॉलोनियों के विरुद्ध कार्रवाई तभी प्रभावी मानी जाएगी, जब नियम सभी पर समान रूप से लागू हों। अब देखना यह है कि निगम कमिश्नर इन सवालों पर क्या रुख अपनाते हैं और क्या शाखा की व्यवस्था में बदलाव के साथ लंबित मामलों की समीक्षा कराकर जवाबदेही तय की जाती है।