चांद में कुलबेहरा नदी किनारे जमीन का विवाद गहराया, सीमांकन रिपोर्ट में सड़क की 0.032 हेक्टेयर भूमि स्टेट हाईवे-46 में शामिल होने का उल्लेख; शिकायतों के बावजूद निर्माण पर कार्रवाई नहीं, दो पक्षों के बीच टकराव की आशंका
Chhindwara 04 November 2026
छिंदवाड़ा यशो:- तहसील मुख्यालय चांद में कुलबेहरा नदी के किनारे जमीन को लेकर सामने आया विवाद अब प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। मामला केवल जमीन की रजिस्ट्री तक सीमित नहीं है, बल्कि आरोप है कि जिस भूमि का हिस्सा चौरई से रेमंड चौक तक जाने वाले स्टेट हाईवे-46 में शामिल है, उसी जमीन की रजिस्ट्री करा दी गई और बाद में वहां दुकानों का निर्माण भी हो गया।
हैरानी की बात यह है कि संबंधित भूमि को लेकर स्टे आदेश होने के बावजूद निर्माण कार्य जारी रहने और दुकानें तैयार हो जाने के बाद भी प्रभावी कार्रवाई नहीं होने के आरोप लग रहे हैं। अब सीमांकन रिपोर्ट में भी संबंधित भूमि का हिस्सा स्टेट हाईवे में शामिल होने का उल्लेख सामने आने से विवाद और गंभीर हो गया है।
सीमांकन रिपोर्ट में सामने आया स्टेट हाईवे का हिस्सा
प्राप्त जानकारी के अनुसार, बीते दिनों राजस्व विभाग के आरआई और पटवारी की मौजूदगी में विवादित भूमि का सीमांकन कराया गया था। 24 सितंबर 2026 को तैयार की गई सीमांकन रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि संदर्भित जमीन के पूर्व और पश्चिम दिशा में 0.032 हेक्टेयर भूमि चौरई से रेमंड चौक तक जाने वाले स्टेट हाईवे-46 में शामिल है।
बताया जाता है कि संबंधित सड़क लगभग आठ वर्ष पहले ही स्टेट हाईवे के रूप में विकसित हो चुकी है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि सड़क में शामिल भूमि का हिस्सा निजी जमीन की रजिस्ट्री में कैसे दर्ज हो गया? यदि सीमांकन रिपोर्ट में सड़क की भूमि स्पष्ट रूप से दर्ज है तो अब तक इस मामले में जिम्मेदारी तय क्यों नहीं की गई?
रजिस्ट्री के समय राजस्व अमले की भूमिका पर सवाल
इस प्रकरण में रजिस्ट्री के पहले की राजस्व प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में है। जानकारी के अनुसार, हरनाखेड़ी हल्के के पटवारी द्वारा रजिस्ट्री से पहले प्रस्तुत प्रतिवेदन में सड़क की भूमि को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं की गई। आरोप है कि सड़क का नक्शा और उसमें शामिल भूमि का हिस्सा अलग किए बिना ही पूरी जमीन की रजिस्ट्री की प्रक्रिया आगे बढ़ा दी गई।
यदि संबंधित भूमि पहले से ही स्टेट हाईवे में शामिल थी, तो रजिस्ट्री के समय इसका परीक्षण क्यों नहीं किया गया? क्या राजस्व रिकॉर्ड और सड़क निर्माण से संबंधित अभिलेखों का मिलान किया गया था? इन सवालों का जवाब अब राजस्व विभाग और मध्यप्रदेश सड़क विकास निगम (एमपीआरडीसी) के अभिलेखों से ही स्पष्ट हो सकेगा।
स्टे आदेश के बाद भी बन गईं दुकानें, अधिकारियों की चुप्पी पर सवाल
विवाद का सबसे गंभीर पहलू चांद के मुख्य मार्ग पर स्टेट हाईवे की बताई जा रही भूमि पर दुकानों का निर्माण है। आरोप है कि इस मामले में स्टे आदेश होने के बाद भी निर्माण कार्य हुआ और संबंधित दुकानें तैयार हो गईं। स्थानीय स्तर पर यह सवाल उठ रहा है कि जब जमीन को लेकर विवाद और कानूनी स्थिति पहले से अधिकारियों के संज्ञान में थी, तब निर्माण रोकने के लिए प्रभावी कदम क्यों नहीं उठाए गए?
बताया जाता है कि तहसील मुख्यालय के अधिकारी दिन में कई बार इसी मार्ग से गुजरते हैं। इसके बावजूद निर्माण को लेकर केवल नोटिस जारी करने जैसी औपचारिक कार्रवाई किए जाने के आरोप हैं। अब दुकानें तैयार होने के बाद भी उन्हें हटाने या आगे की कार्रवाई को लेकर प्रशासन की ओर से स्पष्ट निर्णय सामने नहीं आया है।
यदि स्टे आदेश प्रभावी था और उसके बावजूद निर्माण हुआ है, तो यह जांच का विषय है कि आदेश की जानकारी संबंधित अधिकारियों को कब मिली और उसके बाद निर्माण रोकने के लिए क्या कार्रवाई की गई।
तहसीलदार ने कहा- रिकॉर्ड देखने के बाद ही कुछ बता पाऊंगा
इस मामले में चांद तहसीलदार सुधीर अग्रवाल से जानकारी लेने पर उन्होंने कहा कि उन्हें संबंधित रिकॉर्ड दिखवाना होगा। उनके अनुसार, उनके पदभार ग्रहण करने से पहले जमीन की रजिस्ट्री हुई होगी। रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद ही वे इस संबंध में कुछ स्पष्ट बता पाएंगे।
प्रशासन विवाद को हल्के में न ले, टकराव की आशंका से इनकार नहीं
कुलबेहरा नदी के किनारे जमीन को लेकर दोनों पक्षों के बीच विवाद लगातार गंभीर होता दिखाई दे रहा है। बताया जाता है कि दोनों पक्ष प्रभावशाली हैं और इस संबंध में प्रशासन के समक्ष शिकायतें भी की गई हैं। ऐसे में जिला प्रशासन को मामले को सामान्य भूमि विवाद मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
सीमांकन के दौरान पटवारी स्तर पर कोई त्रुटि हुई है या नहीं, जमीन की वास्तविक स्थिति क्या है और स्टेट हाईवे की सीमा कहां तक है, इन सभी पहलुओं का निष्पक्ष परीक्षण जरूरी है। एमपीआरडीसी और तहसीलदार अपने-अपने अभिलेखों का मिलान कर वस्तुस्थिति स्पष्ट करें। विवादित भूमि का संयुक्त परीक्षण कर वास्तविक स्थिति सार्वजनिक की जानी चाहिए।
प्रशासन की उदासीनता या निर्णय में देरी से दोनों पक्षों के बीच विवाद बढ़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। समय रहते निष्पक्ष कार्रवाई नहीं हुई तो कोई अप्रिय घटना भी हो सकती है। इसलिए जिला प्रशासन को कानून-व्यवस्था की दृष्टि से भी इस मामले को गंभीरता से लेना चाहिए।
अब प्रशासन की जांच और कार्रवाई पर टिकी निगाहें
चांद का यह मामला अब कई महत्वपूर्ण सवालों के जवाब मांग रहा है। स्टेट हाईवे में शामिल भूमि की रजिस्ट्री कैसे हुई? रजिस्ट्री से पहले पटवारी का प्रतिवेदन किस आधार पर तैयार हुआ? सीमांकन रिपोर्ट में सड़क की भूमि दर्ज होने के बाद भी निर्माण कैसे हुआ?
कथित स्टे आदेश के बावजूद दुकानें बनने पर जिम्मेदारी किसकी है?
इन सभी सवालों का जवाब राजस्व विभाग, एमपीआरडीसी और जिला प्रशासन की संयुक्त जांच से ही सामने आ सकता है। फिलहाल स्थानीय लोगों की निगाहें प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं।