अमरवाड़ा में जमीन विवाद पर न्यायालय का बड़ा फैसला, 1999 की बंटवारा डिक्री शून्य घोषित; उसके आधार पर हुए राजस्व नामांतरण और बंटवारे के आदेश भी निरस्त
Chhindwara, 03 November 2026
छिंदवाड़ा / अमरवाड़ा यशो:- । जमीन के बंटवारे में कथित तौर पर फर्जी वारिस बनकर न्यायालय को गुमराह करने और वर्षों पहले हासिल की गई डिक्री के आधार पर भूमि का बंटवारा कराने के मामले में अमरवाड़ा न्यायालय ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। ग्राम रानीकामत, सकरवाड़ा एवं गगोरी की भूमि से जुड़े इस विवाद में व्यवहार न्यायाधीश कनिष्ठ खंड अमरवाड़ा ने वर्ष 1999 में पारित बंटवारा डिक्री को शून्य घोषित कर दिया है।
साथ ही उक्त डिक्री के आधार पर किए गए राजस्व नामांतरण एवं बंटवारे के आदेशों को भी शून्य घोषित कर दिया है। इस फैसले से लंबे समय से अपने वैधानिक हक के लिए संघर्ष कर रहे वारिसों को बड़ी कानूनी राहत मिली है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, वादी अतरलाल एवं अन्य ने न्यायालय में व्यवहार वाद क्रमांक क्र. 1/2024 प्रस्तुत कर भूमि के अवैध बंटवारे को चुनौती दी थी। वादी पक्ष के अनुसार उनकी नानी/दादी भगन बाई की सौत कल्ली बाई थी। भगन बाई की पुत्री लीला बाई वादियों की मां थीं, जबकि कल्ली बाई की पुत्री मीरा बाई थीं।
वादी पक्ष ने न्यायालय को बताया कि ग्राम रानीकामत स्थित भूमि भगन बाई ने 27 मई 1963 को पंजीकृत विक्रय पत्र के माध्यम से खरीदी थी। वहीं ग्राम सकरवाड़ा की भूमि लीला बाई एवं उनकी सौतेली बहन मीरा बाई ने 15 फरवरी 1956 को संयुक्त रूप से पंजीकृत विक्रय पत्र के जरिए खरीदी थी। इसके अलावा उनके पिता स्वर्गीय पतिराम की मृत्यु के बाद पैतृक संपत्ति के राजस्व अभिलेखों में भी दोनों बहनों के नाम दर्ज हुए थे।
ऐसे हुआ कथित तौर पर अवैध बंटवारे का खेल
वादी पक्ष के मुताबिक भगन बाई की मृत्यु के बाद रानीकामत की भूमि पर उनकी पुत्री लीला बाई का नाम फौती नामांतरण के माध्यम से दर्ज हुआ था। लीला बाई की मृत्यु के बाद उनके वैध वारिसों का नाम भूमि अभिलेखों में दर्ज होना था। इसी प्रकार सकरवाड़ा एवं गगोरी की संपत्तियों में लीला बाई और मीरा बाई के हिस्से का नियमानुसार बंटवारा होना था।
आरोप के अनुसार, प्रतिवादी क्रमांक 2 से 4 दरेश, सुरेश एवं मंजू की मां मिनको बाई ने लीला बाई को अपनी बहन बताकर उनके साथ वर्ष 1997 में व्यवहार वाद क्रमांक क्र. 21/1997 प्रस्तुत किया। इस प्रकरण में 29 अक्टूबर 1999 को बंटवारे की डिक्री पारित कराई गई। इसके बाद इसी डिक्री को आधार बनाकर तहसीलदार अमरवाड़ा के समक्ष राजस्व प्रकरण क्रमांक 143/अ-27/2006-2007 प्रस्तुत किया गया।
वादी पक्ष का आरोप था कि इस प्रक्रिया के माध्यम से 9 अप्रैल 2008 के राजस्व आदेश के आधार पर रानीकामत, सकरवाड़ा एवं गगोरी की भूमि का मीरा बाई के साथ कथित रूप से एक-तिहाई हिस्सों में अवैधानिक बंटवारा करा लिया गया, जिससे वास्तविक एवं वैध वारिसों के अधिकार प्रभावित हुए।
25 साल पुरानी डिक्री और राजस्व आदेश न्यायालय ने किए शून्य
मामले की सुनवाई के बाद व्यवहार न्यायाधीश कनिष्ठ खंड अमरवाड़ा ने 29 अक्टूबर 1999 को व्यवहार वाद क्रमांक क्र. 21/1997 में पारित बंटवारा डिक्री को शून्य घोषित कर दिया।
न्यायालय ने उक्त डिक्री के आधार पर किए गए समस्त राजस्व बंटवारा एवं नामांतरण आदेशों को भी शून्य घोषित किया है।
इस महत्वपूर्ण मामले में वादीगण की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संतकुमार उइके एवं सहयोगी अधिवक्ता कमलकुमार करपे ने पैरवी की।
न्यायालय के इस निर्णय को लगभग ढाई दशक पुराने भूमि विवाद में महत्वपूर्ण कानूनी घटनाक्रम माना जा रहा है। इससे वैध वारिसों के भूमि संबंधी अधिकारों की रक्षा की दिशा में रास्ता साफ हुआ है