हर्रई जल जीवन मिशन में खुला भ्रष्टाचार, 2 साल, करोड़ों रुपए, सूखे नल
पानी के नाम पर खर्च हुए अरबों, लेकिन गांवों में आज भी बूंद-बूंद को तरसती जनता - जांच की मांग
Chhindwara 28 November 2025
हर्रई यशो:- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा “हर घर नल से जल” पहुंचाने के उद्देश्य से शुरू की गई जल जीवन मिशन योजना आदिवासी अंचल हर्रई में अफसर–ठेकेदार गठजोड़ की भेंट चढ़ गई है। अरबों रुपए का बजट मिलने के बावजूद हाल यह है कि ग्रामों की पानी टंकियाँ शोभा की सुपारी बनी खड़ी हैं, पाइपलाइनें टूट रही हैं, और योजनाओं की प्रगति कागज़ों में ही दौड़ रही है।
जमीनी हकीकत यह है कि –
हर्रई में पिछले 2 वर्षों से पदस्थ इंजीनियर सत्यम कोल मुख्यालय में रहते ही नहीं।
बताया जाता है कि वे अमरवाड़ा से ही ब्लॉक संचालन करते हैं,
वहीं ठेकेदारों के साथ बैठकों का दौर चलता है,
और शासन को फर्जी प्रगति रिपोर्ट भेजकर करोड़ों का भुगतान पास कराया जा रहा है।
आदिवासी क्षेत्र में जल संकट – पाइप लाइन बिछी, नल लगे, पर पानी नहीं आता
जनपद पंचायत हर्रई जागीर के अंतर्गत ग्राम अहरवाड़ा का हाल तो और भी चिंताजनक है।
घरों में नल कनेक्शन तो लगा दिए गए,
लेकिन पानी टंकी और पाइपलाइन का कनेक्शन कभी जोड़ा ही नहीं गया।
ग्राम के तीन-चार मजरा टोले आज भी पानी के लिए नाले,
झिरिया और बिगड़े हुए हैंडपंपों पर निर्भर हैं।

पाइपलाइनें सड़क किनारे खुली पड़ी हैं, कुछ जगहों पर जंग खा रही हैं,
और कुछ ठेकेदारों के गोदाम में धूल खा रही हैं।
ट्रांसफार्मर लगा, मोटर भी फिट हुई, 8 दिन पानी चला भी,
लेकिन अचानक “मोटर जल गई” बताकर सप्लाई रोक दी गई और आज तक लोग बूंद-बूंद पानी को तरस रहे हैं।
“शासन की आंखों में धूल झोंकने का मॉडल” – कमलनाथ का छिंदवाड़ा मॉडल सवालों के घेरे में
अगर यह वही “मॉडल” है जिसे पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ पूरे प्रदेश में लागू करना चाहते थे, तो जनता वाकई परेशानी में पड़ जाती।
योजना का हाल देखकर सवाल उठना लाज़मी है कि —
👉 क्या यही छिंदवाड़ा मॉडल था?
👉 क्या यही कांग्रेस की विकास दृष्टि थी?
👉 या यह सब ठेकेदार–अफसर गठजोड़ के लिए बनाई गई समानांतर अर्थव्यवस्था?

अब भाजपा सरकार का दावा भी खोखला!
आज प्रदेश में भाजपा सरकार है, जिसे “संवेदनशील सरकार” बताया जाता है। लेकिन हकीकत यह है कि
👉 अफसर मुख्यालय छोड़ बड़े शहरों में आराम से निवास कर रहे हैं,
👉 कलेक्टर के निर्देशों की धज्जियां उड़ रही हैं,
👉 और जनता पानी के लिए दर-दर भटक रही है।
नियम कहता है कि –
अधिकारी मुख्यालय में रहकर कार्य करें, पर हर्रई में यह नियम कागज़ों तक ही सीमित है।
भौतिक सत्यापन की मांग तेज — करोड़ों की योजनाएं कागजों में पूर्ण
स्थानीय ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों ने भौतिक सत्यापन की मांग की है।
कहा जा रहा है कि —
➡ ठेकेदारों ने फर्जी बिल लगाकर करोड़ों का भुगतान उठाया,
➡ टंकियाँ अधूरी, पाइपलाइनें बंद,
➡ सप्लाई बंद,
➡ और नल के नीचे सिर्फ हवा।
प्रशासन को सीधे सवाल:
1️⃣ 9 वर्षों से एक ही स्थान पर पदस्थ इंजीनियर पर कार्रवाई कब?
2️⃣ पाइपलाइन, मोटर पंप, टंकियों का तकनीकी सत्यापन कब?
3️⃣ ठेकेदारों से पार्टनरशिप करने वाले अफसरों पर एफआईआर कब?
4️⃣ क्या आदिवासी क्षेत्र में योजनाओं की लूट पर सरकार आंख मूंदे रहेगी?
समाधान क्या?
✔ तुरंत भौतिक सत्यापन दल गठित कर दौरा किया जाए।
✔ इंजीनियरों की पदस्थापना एवं निवास की जांच हो।
✔ ठेकेदारों के भुगतान रोककर पुन: मूल्यांकन किया जाए।
✔ ग्रामीणों को अंतरिम राहत हेतु टैंकर एवं हैंडपंप सुधार योजना शुरू हो।
“जो सरकार पानी नहीं पहुँचा पाई, वह विकास का दावा कैसे कर सकती है?”
जब जनप्रतिनिधि भाषणों में ‘हर घर नल से जल’ की घोषणा करते हैं और आदिवासी परिवार नाले का पानी पीते हैं, तब सवाल उठना लोकतंत्र का अपराध नहीं, बल्कि ज़िम्मेदारी है।
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रिपोर्टर
📝 मंजू तिवारी, हर्रई, छिंदवाड़ा



