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पोला पर्व: बैलों के प्रति किसानों का पुत्रवत प्रेम और कृतज्ञता का अनोखा उत्सव

भादो अमावस्या को मनाया जाने वाला पोला त्यौहार सिर्फ बैलों का ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, कृतज्ञता और प्रकृति-मानव के अद्भुत संबंध का प्रतीक है।

पोला पर्व: बैलों के प्रति किसानों का पुत्रवत प्रेम और कृतज्ञता का अनोखा उत्सव - Seoni News

“आत्मवत् सर्वभूतेषु” और “वसुधैव कुटुम्बकम्” जैसे उच्च आदर्शों से युक्त हमारी भारतीय संस्कृति केवल मानवीय मूल्यों का संरक्षण ही नहीं करती,

बल्कि प्रकृति और प्राणियों के साथ प्रेम एवं सहअस्तित्व का अद्भुत संदेश देती है। इन्हीं मूल्यों का सजीव उदाहरण है किसानों का त्यौहार – पोला पर्व।

भादो मास की अमावस्या को मनाया जाने वाला यह पर्व किसानों की कृतज्ञता का प्रतीक है।

यह वह दिन है जब किसान अपने सबसे बड़े सहयोगी –

बैलों को पुत्रवत मानकर उनका सम्मान, पूजन और अभिनंदन करते हैं।

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पोला पर्व का महत्व

‘पोला’ शब्द, मराठी के ‘पोरा’ (अर्थात पुत्र) से निकला है। बैलों को पुत्र स्वरूप मानकर उनकी पूजा करना,

उनके साथ आत्मीयता और आभार व्यक्त करना ही इस पर्व का सार है।

यह पर्व विशेष रूप से महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में बड़े हर्षोल्लास से मनाया जाता है।

वेदों में अन्न को ब्रह्म कहा गया है, और अन्न उत्पादन में बैलों का योगदान सर्वोपरि है।

किसान बैलों को सजाकर, आरती उतारकर, उन्हें मीठे लड्डू खिलाकर आभार प्रकट करते हैं।

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कैसे मनाया जाता है पोला?

  • महोबैल (पहला दिन): भादो कृष्ण चौदस को बैलों को विश्राम दिया जाता है।

  • उन्हें नहलाया जाता है, सींगों पर तेल लगाया जाता है,

  • हल्दी-तेल से घावों का उपचार किया जाता है और मीठे पकवान खिलाए जाते हैं।

  • मुख्य पोला (दूसरा दिन): बैलों को दूल्हे की तरह सजाया जाता है।

  • रंग-बिरंगे वस्त्र, गहने, बेलपाती की मालाएं और माथे पर मुकुट से सजे बैल जब ढोल-नगाड़ों के साथ निकलते हैं तो यह किसी बारात से कम नहीं लगता।


  • गाँव के गौठान में बैलों का सार्वजनिक अभिनंदन होता है और पारंपरिक गीत “झडती” गाए जाते हैं।

  • नारबोद/बढ़गा (तीसरा दिन): यह दिन वैदिक परंपरा और गुरुओं-शिष्यों की परीक्षा से जुड़ा है।

  • इसे “कौन बढ़ गया” (बढ़गा) के रूप में भी मनाया जाता है।

बैलों के प्रति पुत्रवत प्रेम

किसान बैलों को केवल श्रम का साधन नहीं मानता बल्कि उन्हें परिवार का हिस्सा, पुत्रवत स्थान देता है।

यही कारण है कि पोला पर्व केवल एक त्योहार नहीं बल्कि भारतीय ग्रामीण संस्कृति की आत्मा है।

संत कबीर की वाणी – “पत्थर पूजें हरि मिले, तो मैं पूजूं पहाड़,
ताते यह चाकी भली, पीस खाय संसार”

इस पर्व को चरितार्थ करती है। किसान उस बैल की पूजा करता है जो खेतों में मेहनत कर अन्न उपजाता है।

सामाजिक समरसता का पर्व

इस दिन मिट्टी या लकड़ी के बैलों (नंदी) का भी पूजन किया जाता है, ताकि बच्चे भी इस परंपरा से जुड़ सकें और समाज के हर वर्ग में समानता बनी रहे।

निष्कर्ष

पोला पर्व केवल बैलों का सम्मान नहीं, बल्कि कृषि संस्कृति, कृतज्ञता, समरसता और भारतीय दर्शन की अद्वितीय झलक है।

यह पर्व हमें याद दिलाता है कि हमारी खुशहाली और अन्न समृद्धि हमारे गौधन की सुरक्षा और संवर्धन से ही संभव है

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