‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ विषय पर सिवनी में भाजपा की प्रभावशाली वैचारिक संगोष्ठी, संविधान, निर्वाचन प्रक्रिया, वोट चोरी के आरोपों, आपातकाल, राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेशी हस्तक्षेप जैसे ज्वलंत मुद्दों पर मुख्य वक्ता ने तथ्यों एवं तर्कों के साथ रखा पक्ष
सांसद भारती पारधी ने बताई संगोष्ठी की पृष्ठभूमि एवं उद्देश्य, जिलाध्यक्ष मीना बिसेन ने रखी प्रस्तावना, साहित्यकारों सहित बड़ी संख्या में प्रबुद्धजनों की सहभागिता; भारत माता के जयघोष और वंदे मातरम् से शुभारंभ, राष्ट्रगान के साथ समापन
Seoni, 31 October 2026
सिवनी यशो:- लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने और सत्ता प्राप्त करने की व्यवस्था नहीं, बल्कि संविधान की मर्यादा, नागरिकों के अधिकार, संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता और राष्ट्र के प्रति नागरिकों के दायित्वों से संचालित एक व्यापक व्यवस्था है। लोकतंत्र में राजनीतिक विरोध, असहमति और सरकार की आलोचना का अधिकार प्रत्येक नागरिक को है, लेकिन इस अधिकार की आड़ में संवैधानिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास पैदा करना, निर्वाचन प्रक्रिया को संदेह के घेरे में खड़ा करना और जनता के बीच भ्रम एवं अराजकता का वातावरण निर्मित करना किसी भी दृष्टि से देशहित में नहीं हो सकता। लोकतंत्र की रक्षा के लिए आवश्यक है कि समाज तथ्यों को समझे, संवैधानिक प्रक्रियाओं के प्रति जागरूक रहे और राष्ट्र की एकता, अखंडता तथा संस्थागत व्यवस्था के प्रति अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करे।

इन्हीं गंभीर राष्ट्रीय, राजनीतिक और संवैधानिक विषयों पर जनजागरण के उद्देश्य से राष्ट्रीय चिंतन संवाद समिति सिवनी द्वारा बारापत्थर पवार मंगल भवन में आयोजित कार्यक्रम में ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ विषय पर एक प्रभावशाली वैचारिक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में मध्यप्रदेश शासन के तीर्थ क्षेत्र एवं मेला प्राधिकरण के अध्यक्ष तथा भाजपा के वरिष्ठ नेता विनोद गोटिया मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे।
उन्होंने अपने विस्तृत, गंभीर और तर्कपूर्ण संबोधन में लोकतंत्र की मूल अवधारणा से लेकर वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों, संविधान की गरिमा, न्यायपालिका एवं निर्वाचन आयोग की भूमिका, विपक्ष द्वारा लगाए जा रहे वोट चोरी के आरोपों, आपातकाल के इतिहास, वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों, राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेशी हस्तक्षेप, धर्मांतरण और सामाजिक विभाजन जैसे अनेक ज्वलंत विषयों पर विस्तार से अपनी बात रखी।

मुख्य वक्ता का संबोधन केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने विभिन्न घटनाओं, ऐतिहासिक प्रसंगों और समसामयिक परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति नागरिकों की जिम्मेदारी को रेखांकित किया। उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि लोकतंत्र की मजबूती केवल सरकारों या राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि इसके संरक्षण में समाज के प्रत्येक जागरूक नागरिक की महत्वपूर्ण भूमिका है।
भारत माता के जयघोष और वंदे मातरम् से हुआ शुभारंभ, प्रबुद्ध वर्ग की उल्लेखनीय सहभागिता
कार्यक्रम का शुभारंभ भारत माता के जयघोष एवं वंदे मातरम् के साथ हुआ। राष्ट्रप्रेम और लोकतांत्रिक चेतना के भाव से आयोजित इस संगोष्ठी में नगर के साहित्यकारों सहित बड़ी संख्या में प्रबुद्ध वर्ग के लोगों की सहभागिता रही। गंभीर राष्ट्रीय एवं संवैधानिक विषयों पर आयोजित इस वैचारिक संवाद में प्रबुद्धजनों की उपस्थिति ने कार्यक्रम को विशिष्ट स्वरूप प्रदान किया। उपस्थित लोगों ने मुख्य वक्ता के विचारों को गंभीरता से सुना।

भारतीय जनता पार्टी की जिला अध्यक्ष श्रीमती मीना बिसेन ने कार्यक्रम की प्रस्तावना प्रस्तुत करते हुए ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ अभियान की आवश्यकता, प्रासंगिकता और उद्देश्य पर प्रकाश डाला। उन्होंने लोकतंत्र की रक्षा और संवैधानिक मूल्यों के प्रति जनजागरण के लिए समाज के प्रत्येक जागरूक नागरिक की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया।
इसके पश्चात सांसद श्रीमती भारती पारधी ने संगोष्ठी की पृष्ठभूमि एवं आयोजन के उद्देश्य की जानकारी दी। उन्होंने वर्तमान परिस्थितियों में लोकतांत्रिक व्यवस्था और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता को रेखांकित किया। कार्यक्रम के जिला संयोजक नगपुरे तथा सिवनी विधानसभा क्षेत्र के कार्यक्रम प्रभारी संतोष अग्रवाल की भी विशिष्ट उपस्थिति रही।
संविधान की रक्षा की बात करने वालों को संवैधानिक मर्यादाओं का पालन भी करना चाहिए
मुख्य वक्ता विनोद गोटिया ने कहा कि भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और इसकी शक्ति केवल चुनाव कराने की प्रक्रिया में नहीं, बल्कि संविधान तथा उसके अंतर्गत स्थापित संस्थाओं की मजबूती में निहित है। लोकतंत्र तभी सशक्त रह सकता है, जब जनता का विश्वास न्यायपालिका, निर्वाचन आयोग और अन्य संवैधानिक संस्थाओं पर बना रहे।

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में असहमति और विरोध स्वाभाविक हैं। सरकार की नीतियों की आलोचना करना, अपनी बात रखना और राजनीतिक विकल्प प्रस्तुत करना प्रत्येक व्यक्ति तथा दल का अधिकार है। लेकिन राजनीतिक असहमति को संवैधानिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास में बदल देना उचित नहीं है। संस्थाओं को राजनीतिक विवादों का हिस्सा बनाकर उनकी निष्पक्षता पर लगातार प्रश्न खड़े करने से लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
उन्होंने कहा कि संविधान किसी एक राजनीतिक दल या विचारधारा की संपत्ति नहीं है। यह देश के प्रत्येक नागरिक और संपूर्ण लोकतांत्रिक व्यवस्था का आधार है। इसलिए संविधान की दुहाई देने के साथ-साथ उसकी मर्यादाओं, प्रक्रियाओं और संस्थागत व्यवस्थाओं का सम्मान करना भी आवश्यक है।
वोट चोरी के आरोपों पर विपक्ष को घेरा, निर्वाचन आयोग की प्रक्रिया को समझाया
श्री गोटिया ने कांग्रेस एवं विपक्ष द्वारा लगाए जा रहे वोट चोरी के आरोपों पर विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि चुनावी सफलता और असफलता लोकतंत्र का हिस्सा हैं। जनता का निर्णय स्वीकार करने के बजाय यदि बार-बार निर्वाचन प्रक्रिया और संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठाकर जनमानस में संदेह पैदा किया जाता है, तो इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति विश्वास कमजोर होता है।

उन्होंने निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्तमान व्यवस्था में प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्रिमंडल के एक सदस्य और नेता प्रतिपक्ष की सहभागिता से चयन की व्यवस्था की गई है। इसके बावजूद निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाना और चुनावी प्रक्रिया को संदेह के घेरे में रखना उचित नहीं है।
मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि समय के साथ मतदाता सूची में परिवर्तन होना स्वाभाविक है। निर्धारित आयु पूरी करने वाले नए पात्र मतदाताओं के नाम जोड़े जाते हैं, मृत व्यक्तियों तथा अपात्र मतदाताओं के नाम हटाए जाते हैं और प्राप्त दावों एवं आपत्तियों के आधार पर आवश्यक संशोधन किए जाते हैं। यह एक नियमित और निर्धारित प्रक्रिया है।
उन्होंने सवाल उठाया कि करोड़ों मतदाताओं वाली सूची में व्यापक स्तर पर मनमाने ढंग से बदलाव कर चुनाव परिणाम प्रभावित करने के आरोपों को किस आधार पर प्रस्तुत किया जा रहा है। यदि किसी मतदाता को सूची में त्रुटि दिखाई देती है तो उसके लिए दावा, आपत्ति और सुधार की निर्धारित व्यवस्था उपलब्ध है।
उन्होंने कहा कि राजनीतिक दलों और कार्यकर्ताओं का दायित्व है कि वे आम नागरिकों को मतदाता सूची पुनरीक्षण की प्रक्रिया समझाएं, ताकि किसी प्रकार का भ्रम न रहे।
आपातकाल का इतिहास याद दिलाकर कांग्रेस की लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता पर उठाए सवाल
अपने संबोधन में श्री गोटिया ने 25 जून 1975 को देश में लगाए गए आपातकाल का उल्लेख करते हुए कांग्रेस के राजनीतिक इतिहास पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के शासनकाल में लगाया गया आपातकाल भारतीय लोकतंत्र का अत्यंत गंभीर और पीड़ादायक अध्याय था।
उस दौर में नागरिक स्वतंत्रताओं पर प्रतिबंध लगाए गए, विपक्षी नेताओं और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को जेलों में बंद किया गया तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सहित लोकतांत्रिक अधिकारों को सीमित कर दिया गया।
उन्होंने कहा कि आज लोकतंत्र और संविधान की रक्षा की बात करने वाले राजनीतिक दलों को अपने अतीत का भी मूल्यांकन करना चाहिए। लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा तब होती है, जब सत्ता में रहते हुए विरोध के स्वर को सम्मान दिया जाए और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा की जाए। केवल राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार संविधान और लोकतंत्र की व्याख्या करना उचित नहीं है।
उन्होंने कहा कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता परिवर्तन का अधिकार जनता के पास है और इसके लिए चुनाव की संवैधानिक प्रक्रिया निर्धारित है। हिंसा, अव्यवस्था अथवा अराजकता के माध्यम से राजनीतिक उद्देश्य प्राप्त करने की प्रवृत्ति देश और समाज के लिए नुकसानदायक हो सकती है।
वैश्विक आर्थिक संकट के बीच भारत की विकास यात्रा का किया उल्लेख
मुख्य वक्ता ने अंतरराष्ट्रीय आर्थिक परिस्थितियों पर चर्चा करते हुए रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़े प्रभावों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि युद्ध के कारण अनेक देशों की अर्थव्यवस्थाएं प्रभावित हुई हैं। कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, महंगाई और अंतरराष्ट्रीय व्यापार की चुनौतियों का असर पूरी दुनिया पर पड़ा है।
उन्होंने भारत की आर्थिक विकास दर लगभग 7 से 7.5 प्रतिशत रहने तथा गरीबी के दायरे से बाहर आए लोगों की संख्या से जुड़े आंकड़ों का उल्लेख करते हुए कहा कि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारत ने विकास की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की है। उन्होंने कहा कि देश की आर्थिक स्थिति का मूल्यांकन करते समय अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों और उनके प्रभावों को भी समझना आवश्यक है। केवल राजनीतिक विरोध के उद्देश्य से आर्थिक उपलब्धियों और चुनौतियों को एकांगी दृष्टिकोण से प्रस्तुत करना उचित नहीं है।
राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमावर्ती क्षेत्रों की संवेदनशीलता पर जताई चिंता
श्री गोटिया ने राष्ट्रीय सुरक्षा को अत्यंत महत्वपूर्ण विषय बताते हुए भारत-नेपाल की खुली सीमा का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि सीमावर्ती क्षेत्रों की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था तथा निगरानी को मजबूत बनाए रखना आवश्यक है। राष्ट्रीय सुरक्षा केवल सीमाओं पर तैनात सुरक्षा बलों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि देश के प्रत्येक नागरिक की सजगता से भी जुड़ी हुई है।
उन्होंने कहा कि देश की सीमाओं से जुड़ी संवेदनशीलताओं, अवैध गतिविधियों और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों को गंभीरता से समझने की आवश्यकता है। राष्ट्रीय हितों से जुड़े विषयों पर समाज को जागरूक रहना चाहिए और किसी भी प्रकार की संदिग्ध गतिविधि के प्रति जिम्मेदारीपूर्ण रवैया अपनाना चाहिए।
धर्मांतरण, विदेशी फंडिंग और सामाजिक विभाजन के मुद्दे पर किया आगाह
अपने संबोधन में मुख्य वक्ता ने धर्मांतरण, विदेशी आर्थिक सहायता और सामाजिक विभाजन से संबंधित गतिविधियों पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने पंजाब में धर्मांतरण से जुड़ी गतिविधियों और विदेशी फंडिंग की भूमिका का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया कि कुछ बाहरी शक्तियां आर्थिक सहायता सहित विभिन्न माध्यमों से भारत की सामाजिक एकता को प्रभावित करने का प्रयास कर सकती हैं।
उन्होंने चीन और कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े कथित विदेशी आर्थिक हस्तक्षेप का विषय भी उठाया। उन्होंने कहा कि देश के भीतर राजनीतिक अथवा वैचारिक प्रभाव स्थापित करने के लिए विदेशी शक्तियों द्वारा किसी भी प्रकार की सहायता या गतिविधि की आशंका को गंभीरता से समझना चाहिए। भारत की संप्रभुता, सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध होने वाली गतिविधियों के प्रति समाज को सजग रहना होगा।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र के आधार पर समाज में विभाजन पैदा करने वाली प्रवृत्तियों से सावधान रहना आवश्यक है। देश की एकता और सामाजिक सद्भाव को बनाए रखना प्रत्येक नागरिक का राष्ट्रीय दायित्व है।
लोकतांत्रिक अधिकारों के साथ राष्ट्रीय दायित्वों का निर्वहन भी जरूरी
श्री गोटिया ने कहा कि लोकतंत्र में प्रत्येक व्यक्ति को अपनी बात रखने, सरकार की आलोचना करने और नीतियों का विरोध करने का अधिकार है। लेकिन अधिकारों के साथ जिम्मेदारियां भी जुड़ी होती हैं। किसी भी राजनीतिक अथवा वैचारिक मतभेद को हिंसा, अव्यवस्था या अराजकता का माध्यम नहीं बनने देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि संवैधानिक संस्थाओं के प्रति सम्मान, न्यायपालिका की गरिमा, निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में जनता का विश्वास बनाए रखना आवश्यक है। किसी भी आरोप या विवाद का समाधान निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से ही होना चाहिए। अफवाहों, भ्रामक प्रचार और अपुष्ट सूचनाओं के आधार पर समाज में भ्रम फैलने से रोकना भी जागरूक नागरिकों की जिम्मेदारी है।
समाज के बीच पहुंचकर लोकतांत्रिक चेतना जागृत करने का आह्वान
मुख्य वक्ता ने भाजपा कार्यकर्ताओं और समाज के जागरूक नागरिकों से आह्वान किया कि वे लोकतंत्र, संविधान, निर्वाचन प्रक्रिया और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े विषयों को केवल राजनीतिक मंचों तक सीमित न रखें, बल्कि समाज के बीच जाकर इन पर संवाद करें। लोगों को मतदाता सूची पुनरीक्षण की प्रक्रिया, संवैधानिक प्रावधानों और लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका की जानकारी दें, ताकि किसी भी प्रकार के भ्रम और अविश्वास की स्थिति को दूर किया जा सके।
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए जागरूक और जिम्मेदार समाज का होना आवश्यक है। संविधान की प्रतिष्ठा, संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान और राष्ट्र की एकता एवं अखंडता की रक्षा प्रत्येक नागरिक का दायित्व है। राजनीतिक विरोध को लोकतांत्रिक मर्यादाओं के भीतर रखते हुए वैचारिक स्तर पर उसका जवाब दिया जाना चाहिए।
राष्ट्रगान के साथ हुआ गरिमामय समापन
‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ विषय पर आयोजित यह संगोष्ठी संविधान, लोकतांत्रिक व्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा और वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श का मंच बनी। मुख्य वक्ता श्री विनोद गोटिया के विस्तृत एवं तर्कपूर्ण संबोधन ने आयोजन को वैचारिक गंभीरता प्रदान की। संगोष्ठी में साहित्यकारों सहित बड़ी संख्या में प्रबुद्ध वर्ग की उपस्थिति ने भी राष्ट्रीय विषयों पर समाज के जागरूक वर्ग की रुचि और सहभागिता को रेखांकित किया।
कार्यक्रम का संचालन संदीप मिश्रा द्वारा किया गया । भारत माता के जयघोष और वंदे मातरम् से प्रारंभ हुआ कार्यक्रम राष्ट्रगान के साथ गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। आयोजन के माध्यम से लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति जागरूकता, संवैधानिक संस्थाओं के सम्मान और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने का संदेश दिया गया।