"शिक्षक कभी सामान्य नहीं होता, निर्माण और विध्वंस उसकी गोद में खेलते हैं।" - शिक्षक दिवस विशेष
यदि शिक्षक साहस दिखाते हैं और गलत को गलत कहते हैं, तो शिष्य समझते हैं कि सत्य और न्याय के लिए आवाज़ उठाना उनका कर्तव्य है
लेखक: मनोज मर्दन त्रिवेदी
समाज में एक प्रचलित उक्ति है – “कोउ नृप होई, हमै का हानि।”
आज भी जब कोई गलत नीतियाँ सामने आती हैं और समाज में अन्याय बढ़ता है, तब लोग चुप रहकर इसी भाव को दोहराते दिखाई देते हैं। परंतु, यह भूल जाते हैं कि यह पंक्ति रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने त्रेतायुग के पात्र मंथरा के संदर्भ में लिखी थी।
मंथरा अपने स्वार्थपूर्ण हित और महारानी के लाभ के लिए यह कथन करती है। समाज ने उसे त्रेतायुग से ही तिरस्कार और हेय दृष्टि से देखा है। किसी माता-पिता ने अपने बच्चे का नाम मंथरा नहीं रखा; यह नाम समाज में गाली के रूप में प्रयोग होता है।
इसका अर्थ यह है कि जो व्यक्ति अन्याय, गलत नीतियों और अव्यवस्थाओं का समर्थन करता है या जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ता है, वह समाज के लिए मंथरा जैसा दोषी माना जाता है।
शिक्षक की भूमिका: मौन नहीं, मार्गदर्शक
एक शिक्षक का दायित्व केवल पाठ पढ़ाने तक सीमित नहीं है। आचार्य चाणक्य की वाणी स्मरण कराती है –
“शिक्षक कभी सामान्य नहीं होता राजन, निर्माण और विध्वंस उसकी गोद में खेलते हैं।”
यानी, शिक्षक के हाथों में नई पीढ़ी का निर्माण भी है और समाज की बुराइयों का विध्वंस भी।
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यदि शिक्षक मौन हो जाए, तो आने वाली पीढ़ी दिशाहीन हो जाती है।
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यदि शिक्षक गलत को गलत कहने का साहस न दिखाए, तो उसके शिष्य भी अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाना भूल जाते हैं।
शिक्षक और शिष्य
साथ ही, शिक्षक केवल ज्ञान देने वाले नहीं होते। उनका व्यवहार, दृष्टिकोण और साहस शिष्यों पर प्रभाव डालता है।
यदि शिक्षक अन्याय के खिलाफ मौन रहते हैं, तो शिष्य भी यही सीखते हैं।
लेकिन यदि शिक्षक साहस दिखाते हैं, गलत को गलत कहने में संकोच नहीं करते, तो शिष्य समझते हैं कि सत्य और न्याय के लिए आवाज़ उठाना उनका कर्तव्य है।
शिक्षक अपने उदाहरण, मार्गदर्शन और सुरक्षित संवाद के माध्यम से शिष्यों में विश्वास, आत्मनिर्भरता और नैतिक साहस उत्पन्न करते हैं।
इस भरोसे और प्रेरणा के बिना शिष्य अकेला और दिशाहीन रह जाता है।
इसलिए शिक्षक का साहस और मार्गदर्शन ही शिष्य को सजग और जिम्मेदार नागरिक बनाता है।
आज की परिस्थिति
आज हमारे समाज में अनेक विसंगतियाँ स्पष्ट हैं—
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शिक्षा में असमानता
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प्रशासनिक अव्यवस्थाएँ
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भ्रष्टाचार
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सामाजिक कुरीतियाँ
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जातीय और भाषाई संघर्ष
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समाज को तोड़ने वाली मानसिकताएँ
यदि शिक्षक इन विषयों पर केवल “हमें क्या लेना-देना” कहकर मौन रह जाएँ, तो यह मौन भी एक अपराध बन जाता है।
शिक्षक का असली सम्मान
शिक्षक दिवस पर असली सम्मान यही है कि हम शिक्षक की भूमिका को केवल गुरुजी कहकर नमन करने तक सीमित न करें।
बल्कि, उनसे यह अपेक्षा करें कि वे अन्याय और विकृतियों के विरुद्ध खड़े हों, समाज को सजग करें और नई पीढ़ी में साहस भरें।
आज सरकारी शिक्षा प्रणाली की एक बड़ी कमजोरी यह है कि इसमें तकनीकी, प्रबंधन और सामान्य ज्ञान तो है, लेकिन संस्कार और कर्तव्यबोध का समावेश नहीं है।
माता-पिता बच्चों के अच्छे अंक और नौकरी को लेकर चिंतित हैं, पर उन्हें अच्छा नागरिक बनाने की चिंता नहीं है।
शिक्षकों पर अनेक बंदिशें हैं। वे न डाँट सकते हैं, न अनुशासन दिखा सकते हैं।
संस्कार और कर्तव्य की शिक्षा देने पर भी कई बार उन्हें सांप्रदायिक ठहराने का खतरा होता है।
इसका परिणाम यह होता है कि –
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नौकरी मिलने पर युवा अधिकारों का दुरुपयोग करते हैं
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पद और जिम्मेदारी से अधिक सुविधा और कमाई पर ध्यान देते हैं
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प्रभावित नेताओं और अधिकारियों की खुशामद में लग जाते हैं
यदि नौकरी नहीं मिलती, तो कई युवा अनैतिक गतिविधियों और गलत धंधों की ओर बढ़ते हैं।
यह सब कमजोर शिक्षा व्यवस्था का दुष्परिणाम है।
फिर भी उम्मीद जिंदा है
इन सबके बावजूद अनेक शिक्षण संस्थान और शिक्षक समाज को नई राह दिखा रहे हैं।
विशेषकर विद्या भारती के सरस्वती शिशु मंदिर, जो आज भी संस्कारों की पाठशाला के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
यहाँ का आचार्य परिवार अल्प मानदेय में, तप और समर्पण के साथ विद्यार्थियों को संस्कार और कर्तव्य की शिक्षा देता है।
शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत हर शिक्षक दीपक की तरह है। वे स्वयं को जलाकर समाज से अंधकार दूर करते हैं।
निष्कर्ष
संक्षेप में, शिक्षक कभी सामान्य नहीं होता। उसकी मौनता भी समाज को प्रभावित करती है और उसका साहस भी।
यदि हमें सशक्त और जागरूक राष्ट्र चाहिए, तो हमें “मंथरा जैसी चुप्पी” नहीं, बल्कि “चाणक्य जैसा मार्गदर्शन” चाहिए।




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